यशोधरा-प्रीति





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आज भी होली का त्यौहार दरवाजे पर दस्तक दे रहा था.आज यशोधरा ने इस के स्वागत के लिए अपने जीवन के द्वार हमेशा- हमेशा के लिए बंद कर दिए थे. यही तो वह दिन था जिस दिन उसने अपने पति आशीष को खो दिया था .एक के बाद एक घटनाओं के चित्र उसकी आंखों के सामने आ रहे थे .वह उन में डूबते जा रही थी.गहराई में... और गहराई में ...तेरह अप्रैल की सुबह आशीष ने उसके कान में धीरे से कहा था"  होली मुबारक हो  प्यारी यशु".यशोधरा को ऐसे लगा था जैसे उसके कानों में मधुर संगीत बज गया हो.प्रेम की कितनी  मिठास घुली थी उन शब्दों में... प्रतिवर्ष होली के त्योहार पर यशोधरा जमकर होली खेलते थी.उसे  ये रंग बहुत प्यारे लगते थे. बहुत अच्छी लगती थी उसे यह रंग बिरंगी दुनिया. उसे महसूस होता था कि यदि रंग नहीं हो तो जीवन उतना ही नीरस होगा, जितना कि एक उम्र कैद की सजा पाए कैदी का होता है .होली के दिन यशोधरा पूरे गांव को रंगों से सराबोर कर देती थी .गांव के सभी लोग चाहे वह नौजवान हो या साठ वर्ष का वृद्ध यशोधरा को मौसी कहकर पुकारते थे. उसके साथ की भी तीन-चार औरतें थी, जो होली के दिन उसके साथ मिलकर गांव में होली खेला करती थी. यशोधरा उन सबकी लीडर थी.जिधर यशोधरा  इशारा कर देती थी, पूरी टोली उसी तरफ अपने कदम बढ़ा देती थी.भोर होने से पूर्व ही यशोधरा और उसकी सखियां गांव के कुएं से पानी निकालकर घर के सारे बर्तनों को लबालब भर देती थी.इसके बाद वे घर के बनाए गए पक्के रंगों को घोल कर रख  देती थी. सारी सहेलियां कितनी खुश होती थी .फूलवती खिलखिलाती "मौसी रंग पक्का है भी या नहीं?रंग इतना पक्का  होना चाहिए कि अगली होली तक भी नहीं उतर पाये".थोड़ा दिन चढ़ते -चढ़ते ही शुरू हो जाता था उनकी होली का करतब .यशोधरा  पूछती" अरे फूलवती, चंपा अरे यह तो बताओ कि गांव में नई बहू  किस के घर में आई है ?फिर उसी घर पर टूट पड़ता था  मौसी और उनकी सखियों का होली का गुबार।

 

"अरे मौसी यह क्या घर की तो अंदर से कुंडी लगी हुई है".कलावती ने परेशान होते हुए कहा.यशोधरा अपने रंग-बिरंगे घाघरे को समेटते हुए कहती है "तो मौसी कौन से दिन के लिए हैं?"वह दीवार फाँदकर घर के अंदर घुस जाती है.और थोड़ी ही देर में घर की कुंडी खोल देती है. घर के सभी आदमी होली के दिन पंचायतों में होली मनाते थे. घर में औरतें ही होती थी. और मौसी अपनी टोली के साथ पहुंच जाती थी नई नवेली दुल्हनों को परेशान करने. फूलवती, चम्पा और कलावती तीनों मौसी से  कहती हैं "मौसी यहां तो चारपाई पर अकेली यह अम्मा जी बैठी हैं ,इनके साथ होली खेलने में क्या खाक मजा जाएगा ?मौसी कैसे भी करके इनकी बहू को सामने लाओ.तब मौसी अम्मा से आकर कहती  हैं "अरे अम्मा आपने लालमन का ब्याह भी रचा लिया और हमें खबर भी नहीं दी. कम से कम दुल्हनिया का मुखड़ा तो दिखा देती.सुना है बहुत सुंदर है हमारे लालमन की बहू.अम्मा ने  जैसे ही अपनी बहू की प्रशंसा सुनी वैसे ही वे गदगद हो गईं.और यह भी भूल गई की होली के दिन यशोधरा ऐसे ही भोली सूरत बनाकर नई नवेलियों  को रंग देती है.वह उठ कर बैठ जाती हैं, और आवाज़ लगती हैं

" अरी लाजो... ओ लाजो...इधर देख तो कौन आया है?" लाजो कमरे से निकलती है,लजाती...सकुचाती..बिल्कुल नाम के अनुरूप. उसका रंग साँवला था, किंतु आंखे इतनी कटीली की हिरनी भी देखकर शर्म आ जाए. उसका नाम तो था लाजवंती किंतु प्यार से सभी उसे लाजो कहते थे. मौसी उसका मुखड़ा देखने के बाद फूलवती, चंपा और कलावती से कहती हैं "भाई खड़ी-खड़ी मेरा मुंह क्या देख रही हो? जाओ शायद बाहर दरवाजे पर आते समय मेरा बटवा गिर गया है, ले आओ. बहुरिया के लिए मुंह दिखाई भी तो देनी होगी ."।

चंपा फूलवती और कलावती मुस्कुराते हुए बाहर जाती हैं और यशोधरा का इशारा पाकर रंगों से भरे बर्तन ले आती हैं .इसके बाद चारों मिलकर लाजो को रंग देती हैं. लाजो का मुखड़ा शर्म से लाल हो जाता है. अम्मा झूठे गुस्से से बुदबुदाती हैं "यशोधरा तू नहीं सुधरेगी. कम से कम अपनी उम्र तो देख, दस साल बाद ही बाल सफेद हो जाएंगे. मौसी की टोली हँसती- ठिठोली करती हुई  अपने अगले निशाने पर प्रस्थान करने का मन बनाती है ,कि तभी ... मौसी के ऊपर किसी ने पिचकारी का रंग उड़ेल दिया .ऊपर देखते हैं सुखिया खड़ी थी छत पर. हाथ में पिचकारी लिए.सुखिया अपनी उंगलियां नचाते हुए कहती है "क्यों  मौसी मेरा होली खेलने का तरीका तुम्हें भाया या नहीं? मेरी भाभी को तो आपने ऊपर से लेकर नीचे तक रंग दिया.और मेरी आपको याद भी नहीं आई ." वह लाजो की नंद सुखिया है. तभी यशोधरा, चंपा, और फूलवती को इशारा करती हैं वे दोनों तेजी से छत पर जाकर सुखिया को जबरदस्ती नीचे ले  आती हैं.फिर वे सब जमकर होली खेलती हैं.जब शाम को खेलते खेलते वे थक जाया करती थी. तो हौदे में नहाया करती थी. यशोधरा को छोटे-छोटे बच्चों से बहुत प्यार था.गांव के सारे बच्चों को वह अपना समझती थी.वह छोटे -छोटे बालकों के साथ बिल्कुल बालक बन जाती थी.दुर्भाग्य से उसकी शादी को आठ साल बीत गए थे ,किंतु अब तक उसकी गोद सूनी थी. उसे बच्चे की कमी  आशीष ने कभी महसूस नहीं होने दी.अपने प्यार से वह उसके जीवन को महकाता था.वह उसके जीवन का रंग था.उसके जाने के बाद जीवन रंगहीन बन गया था. जीने का आधार खत्म हो गया था.जीने की आशा मिट चुकी थी. सारी खुशियां सो गई थी.अब  यशोधरा को देख कर यह विश्वास ही नहीं होता था यह वही यशोधरा है जो हर क्षण पंछियों की तरह चहचहाती रहती थी.वे रंग जिनके बिना वह जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी ,आज उन रंगों के नाम से भी दूर भागती थी.डरती थी उनकी परछाई से भी.. उस दिन भी तो वह अपनी सहेलियों के साथ दिनभर होली खेल कर आई थी. उसने नहाने के लिए पानी रखा ही था कि गांव में खबर आई कि आशीष का एक्सीडेंट हो गया है .

सुनकर उसके पैरों तले की जमीन खिसक गई थी.वह जिस भेष में थी उसी भेष में चल पड़ी.अपने आँचल को ठीक करते हुए, उमड़े हुए आँसुओं के सैलाब को जब्त करते हुए वह चल दी. प्रत्येक होली की तरह इस बार भी उसके लिए शहर से साड़ी लेने के लिए आशीष गए हुए थे. उसे क्या पता था कि ऐसा हो जाएगा? वह  घटनास्थल पर पहुंची ,आशीष का चेहरा खून से लथपथ था. पास में ही एक साड़ी थी थैले में.उसने आशीष का सिर अपनी गोद में रख लिया.उसके आंसू गालों से लुढ़क लुढ़क कर आशीष के मस्तक पर गिर रहे थे.यशोधरा ने लाख पुकारा "उठो ...   उठो .. आशीष... देखिए मैं फिर नाराज हो जाऊंगी। क्या आप मुझे मनाएंगे नहीं ?"लेकिन आशीष का निर्जीव शरीर कुछ बोल नहीं पाया. गांव वाले आशीष के शव को गांव में ले आए.गांव की औरतें यशोधरा को संभालने लगी.सभी उसे तरह-तरह के दिलासे देती रहीं. कोई कहती "होनी को कौन टाल सकता है". तो कोई कहती 'जो जीवन में आता है उसे एक ना एक दिन अवश्य जाना पड़ता है।

ऐसे ही अनेक कथन उसके कानों में गूंजने लगे.जब दुख की सीमा पार होने लगती है, तो आंसुओं में इतनी क्षमता नहीं रह पाती कि वह अपने प्रवाह को जारी रख सकें.दुख के बोझ को सहन कर सके . आंखे खुश्क हो जाती हैं.उसके बाद ही यशोधरा मूक प्राणी की तरह यह जीवन रूपी बनवास काटने लगी.आशीष की मृत्यु के बाद गांव में किसी ने भी उसे बोलते नहीं देखा था. उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो अठखेलियां करती हुई नदिया का प्रवाह एकदम रुक गया हो .उसके जीवन में वक्त की कालिख पुत चुकी थी.खुशियों की जगह उदासी के बादल उसके जीवन में उमड़ने लगे थे. मुस्कुराहट की जगह दुख का और विषाद का संगीत बजता रहता था. अतीत में वह न जाने कितने समय से गुम थी, कि आठ बजने से पहले ही उसकी तंद्रा भंग हुई. वह अपनी लाठी टेकते और तेजी से कदम बढ़ाते हुए घर के बाहर आ जाती है .उसे आठ बजे से पहले गांव के उसी छोर पर पहुंचना था, जहां आशीष उससे बिछड़ गया था.जहां उसके और आशीष के बीच में मृत्यु दीवार बनकर आ गई थी.

 वह चलती जा रही थी तेजी से... और तेजी से.. उसकी सांसें फूल रही थी .वह जगह आने ही वाली थी कि लाठी उसके हाथ से छूटकर  गिर गयी. अचानक एक ठोकर लगी और वह जमीन पर गिर पड़ी.उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पूरी पृथ्वी घूम रही हो. सारे पेड़ गोल -मटोल चक्कर लगा रहे हो.आकाश उसके ऊपर गिरने के लिए आतुर हो रहा हो.उसे लगा मानो आशीष उसे पुकार रहा हो.अपनी बाहें फैलाकर ,यशोधरा तुम कब आओगी ?मैं कब से तुम्हारे आने की प्रतीक्षा में खड़ा हूं.उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट दौड़ गई. उसने अपनी उखड़ी हुई सांसो पर काबू पाते हुए कहा "आशीष आपको और इंतजार नहीं करना पड़ेगा... मैं आपके पास आ रही हूं ..."और फिर एक झटके में जिंदगी का मौत से मधुर मिलन हो गया.।

 

 

प्रीति चौधरी (मनोरमा)

जनपद बुलन्दशहर

उत्तरप्रदेश

मौलिक एवं अप्रकाशित

 


 


 

 



 

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