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बरसो मेघा झूमके, प्यासा है अंतर्मन,
हृदय मयूर घूम के करता है अब नर्तन,
शुष्क होने न पाए प्रेम पीयूष की गागर,
बरसो इस तरह भीग जाए देह उपवन।
बरसो मेघा झूमके,प्यासा है अंतर्मन।
श्याम केश खोलकर आयीं हैं रूपसी घटाएँ,
बरखा की रिमझिम हृदय को गुदगुदाए,
हृदय अधीर हो रहा है प्रेम रस पान के लिए,
भीगी फुहारों से भर दो उर का कोमल आँगन।
बरसो मेघा झूमके, प्यासा है अंतर्मन।
सावन तुम्हारे लिए प्रतीक्षारत है हृदय,
रेगिस्तान न बन जाये कहीं धरा का निलय,
धरा का रोम रोम पुकारता है तुम्हें सावन,
हर्षोल्लास के पर्व जैसा है तुम्हारा आगमन,
बरसो मेघा झूमके, प्यासा है अंतर्मन।
ध्यानपूर्वक सुनो भूमि की मौन कराह,
भीषण ग्रीष्म क्षणों में जीवन करते हैं निर्वाह,
आओ वर्षा का रुपहला घन बनकर हे मेघ,
हर लो इस जीवन की यह असह्य अगन।
बरसो मेघा झूमके, प्यासा है अंतर्मन।
प्रीति चौधरी "मनोरमा"
जनपद बुलन्दशहर
उत्तरप्रदेश
मौलिक एवं अप्रकाशित
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