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किसी उलझन
सी...
उलझी लटों के ..
टूटे गुच्छे और...
टेढ़ा-मेढ़ा सा माथे
का कुमकुम उसका,
पनीली आँखों में...
सूखे, पसरे काजल
की कोर..
पपड़ी होठों से रिसता
सा लहू...अभी-भी,
वो...
उनके लिए ऐसी हीं
किसी साँझ...
तब...
जलते तवे से
रसोई में रोटियाँ
उतारते हुये उसकी
नाज़ुक ऊँगलियाँ
चिटकती...
फिर उसने समर्पित
किया एक टुकड़ा प्यार
का ,रोटियाँ कुछ उम्मीद
की थाली में ...
शायद थोड़ी जल गई
थीं बचाने की कोशिश
में उसकी उँगलियों
की मानिंद,वो रोटियां...
पुनः किया प्रहार उसने
चिमटे से जो पास हीं
पड़ा था,प्यार के...
उस टुकड़े पर जो
घायल था और
फिर...एक
और ...
कोशिश...
इंदु उपाध्याय, पटना
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