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गहरे आसमान में रात ऐसी लग रही थी जैसे सितारों की शबनमी साड़ी पहनी हो | मधुर धुन में गाना बज रहा था "सारे सपने कहीं गए, हाए हम क्या से क्या हो गए | अबोली रात की निस्तब्धता, खिड़की से झांकते चाँद और शीतल शर्द हवा के झोंकों ने मज़बूर कर दिया कुछ पल जीने को | वातावरण इतना मनोहारी था कि घर पहुँचने की शीघ्रता भूल कर हाईवे पर गाड़ी का स्पीडोमीटर बस तीस चालीस की रफ़्तार में चलाना सुखद लग रहा था |
कुछ किलोमीटर ही चली थी किन्तु दिन भर की थकान ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। आँखें बार - बार मुंदने लगी | समय देखा तो घड़ी रात के साढ़े बारह बजा रही थी , अभी ढाई तीन घंटे का सफ़र बाकि है घर तक के लिए | पहली बार लगा की बीच में कोई होटल दिखे तो रात वहाँ गुजारी जाए |
देर रात में ऐसी पहली बार था होटल में रुकना, होटल पहुँचते ही अभिवादन कर्ता से लेकर मालिक तक की अकेले जिम्मेदारी निभाने वाले आदमी ने कार की आवाज़ सुनी तो कुर्सी पर बैठे- बैठे ही मेरी ओर अलसाई नजरों से देखा | उसके सामने पहुंची तो एक नज़र नीचे से उपर तक देखने लगा |
मैडम आप सरकारी अधिकारी है ?. बोला वो
हाँ... मैंने कहा
आप किस विभाग में ? उसका दूसरा सवाल
मुझे रात भर रुकना है कमरा मिलेगा ? मैंने बात टालते हुए उससे पूछा
मुस्कराते हुए वो बोला "जी जरुर"
अब भी उसके भीतर मुझसे कुछ जानने की छटपटाहट थी, पर मेरे पहले जवाब के कारण असमंजस में था कि पूछा जाए या नहीं |
हमारे पास सिंगल, डबल बेडेड रूम्स और डोरमेट्री भी है | मेरी रूम की पसन्द से भी ज्यादा उसकी नज़रें यह जानने को उत्सुक थी कि मैं किस विभाग में काम करती हूँ, उसे लगा शायद पैसे कम मिलेंगे या मुफ्त की सेवा लुंगी | इस चक्कर में कोई गंदा कमरा न दे, दे, इसलिए मैंने उसका भ्रम दूर किया | अरे भाई किसी भी विभाग से रहूँ तुम्हारे पैसे पूरे दूँगी और जाते वक़्त भी | साफ़ सुथरा रूम, जिसमें बड़ी सी बालकनी बाहर खुलती हो | अब उसका अधिकाकांश भ्रम दूर हो गया था, डबल बेड न ?
अब की बार मैं थोड़ी ज़ोर से बोली, हाँ भाई समझ में नहीं आता है क्या ?
सॉरी मैम, कहा और चुपचाप सामान लेकर कमरे में गया, सामान रखा |
सर.... खाने में क्या लेंगी ?
खाना खाया हुआ है..... बोली मैं
ठीक है और व्हिस्की या बियर ? वो फिर बोला
न, न दारू नहीं चाहिए,अब गुस्सा आ रहा था मुझे।
ज्यादा नहीं दो पैग ले लीजिए...फिर बोला
नहीं कह दिया ना, कम समझते हो क्या ?
जी सॉरी... बोला उसने
सर, मैडम जी और कुछ व्यवस्था ?
सारी व्यवस्था है मेरे पास अब जाओ. मैं बोली
पानी की बोतल और एक कप चाय पहुँचा दो बस... माँगा मैंने
जी सर, नीचे मैं वहीँ पास के कमरे में सो रहा हूँ काम हो तो बता दीजियेगा |
ओह्ह...माथा चाट गया, नींद आ रही थी उड़ा दी इसने |
बालकोनी में रखे सोफ़े पर फैल सी गई मैं , इतने में वह चाय दे गया |
आह ! यामिनी खूबसूरत काली चुनर सी झिलमिलाती भली लगी, मानो दुधिया रौशनी में तुम्हारे दांतों की पंक्ति मोतियों सी चमक रही हैं , जैसे मोतियों की माला पहन रखा हो, इस तरह मुस्कराते हुए तुम कितने भले सच्चे और प्यारे लगते हो अरे ! सर्दी कितनी बढ़ गई, तुम तो ठिठुर रहे हो
दूर क्यों हो ठण्ड लग जाएगी, इधर आ जाओ न मेरे पास, बाँहों में, तुम्हे भी सुकून आ जाएगा और मुझे भी , आओ जाओ न मिल कर इस खुबसूरत आसमान को निहारते है,चन्द्रमा की चांदनी का आस्वादन करते हैं , मुझे पता है लैंप की रौशनी में तुम कभी मेरे पास नही आते , चाँदनी की इस रौशनी में चार पांच फीट से आगे दृश्यता नहीं है, रेगिस्तान के इस सूने जंगल में सामने के पेड़ पर कोई उल्लू हो तो अलग बात है वर्ना इस अँधेरी रात में तुम्हारे, मेरे और चाँद तारों के सिवाय कोई साक्षी नहीं बनने वाला jamaray फिर क्या सोच रहे हो ?
तुम भी कितने अजीब हो ? भला इस तरह कोई कभी चुप रहता है? जैसे बोलना ही भूल गए हो, | इससे तो बेहत्तर था कि मैं चुप रहती , तुम्हारे इस भोले चेहरे पर बड़ी - बड़ी मासूम आँखों और नाक के नीचे मासूमियत भरी मुस्कराहट निहारती | सूर्य के प्रकाश से कवियों का प्रिय शशि इस धरा पर जितना खूबसूरत दिखता है अभी उससे भी मोहक लग रहे हो, तुम्हारा अप्रतीम आकर्षक मुख चन्द्रमा के दूधिया प्रकाश में | दिल चाहता है कभी सवेरा ही न हो, बस यह सुहानी, सुकून भरी रात चलती ही रहे घण्टों, दिनों महीनों और वर्षों तक, जैसे गगन में सप्तऋषि आपस में हाथ पकड़ बैठे है न उसी प्रकार मैं भी तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेकर बैठी रहूँ बस , पर तुम मानते ही कहाँ हो।
इन चाँद तारों से या फिर हवा का यह शीतल स्पर्श एकान्त का अनुभव नहीं होने देता,आसपास ही किसी के होने का अहसास करवा रही है ? तारों से दृष्टि हटा उधर देखा तो मेरा सितारा तो सोफे पर था ही नहीं | तुम भी कितने खुदगर्ज़ हो नींद आ रही थी तो बोल देते मैं यहाँ किसलिए हूँ ? ये चांद तारे, हवा की शीतलता, निशा की मादकता सब कुछ तुम्हारे होने से ही तो है, तुम नहीं तब ये कहाँ, इनकी तो बात छोड़ो तुम्हारे बिना मुझमें मैं भी कहाँ?
सुबह छः बजे होटल वाले को चाय के लिए कह रखा था, उसके घंटी बजाने पर दरवाजा खोली | चाय रखते हुए उसकी नज़रें कुछ ढूंढ रही थी बिस्तर में मैं ही थी। थोड़ा सा इधर - उधर होते हुए उसने बालकनी पर नज़रें टिकाई वहां खाली सोफ़े पड़े थे, बाथरूम का दरवाज़ा बंद था उसके कानों को शायद वहां से किसी आवाज़ की अपेक्षा थी पर निराशा हाथ लगने से बाहर निकल गया |
हाथ मुंह धो, चाय पीने लगी तो देखा मेरे अकेले के लिए चाय के दो कप हैं, इस खूबसूरत सुबह की चाय अब मेरे लिए आन्ददायक होने की बजाय रहस्यमयी होती जा रही थी | उस लड़के का ताक झाँक करना, दो कप चाय लेकर आना | मेरी समझ से परे था, थोड़ी देर बैठी रही रही फिर सोचा जाने दो पूछना क्या है , रात बितानी थी बस, ऐसे किस किस का कि बातें सोचती रहूँ, उसकी तो वही जाने |
तैयार हो कर नीचे आई चाबी दी तो उसने कहा मैडम दो मिनिट बैठें अभी हिसाब करता हूँ | वह ऊपर गया रूम देख कर बंद किया और नीचे आया | अब मुझसे ज्यादा रहस्य उसके मन में था इसलिए बोल पड़ा | साब. मैडम बुरा नहीं माने तो एक बात पूछूँ ?
हाँ पूछ...
सर मुझे यहाँ नौकरी करते उन्नीस, बीस बरस हो गए। कुछ थके हारे ट्रक ड्राईवर दो चार घंटे नींद लेने रुकते है वे डोरमेट्री से काम चला लेते हैं, बाकि अधिकांश लोग कमरे लेते है तो अपनी मनपसन्द दारू और लड़की की तो कुछ मैडम लड़कों की डिमांड करती हैं | इसीलिए आपको भी कह कर गया था कमरे में सोने जा रहा हूँ पर बहुत कोशिश के बाद भी आपको न तो बाहर जाते देखा, न उसे भीतर आते और न ही अभी किसी को कमरे से बाहर निकलते |
कहना क्या चाहते हो तुम ? न तो मैं बाहर गया और न ही कोई मेरे कमरे में आया तो मेरे सिवाय बाहर कौन निकलेगा ?
माफ़ कीजिएगा , बुरा मत मानिएगा मालिक का भी आदेश है कि उनकी जरुरत के हिसाब से चार्ज लेना बाकि किसी से कोई पूछताछ नहीं करना, इसलिए मैं कोई पूछताछ नहीं कर रहा, आपसे तो एक्स्ट्रा वाले चार्जे भी नहीं लूँगा पर रात से लेकर सुबह होने तक मेरा दिमाग फटा जा रहा है कि वो कहाँ से आए और कहाँ गएँ जिससे आप घण्टों तक रात को बातें कर रही थीं |
ओह्ह...क्या सचमुच मैं रात को उससे बातें कर रही थी ? जब मन होता है वो आते हैं और अचानक से चले भी जाते हैं , रात को भी ऐसा ही हुआ, बालकनी से उठकर भीतर कमरे में कब आ गये मुझे भी पता नहीं चला, मेरी माँ और दोस्त भी कहते है मुझे वहम होता है ऐसा कई बार हुआ पर वह मेरे सामने होते है बातें होतीं हैं , यह वहम कैसे हो सकता है ?
छोटे मुँह बड़ी बात पर मैडम बुरा नहीं मानें तो एक बात बोलूं ?
बोलो
मैं आश्वस्त था कि कोई लड़का नहीं था फिर भी शंका थी इसलिए आपसे पूछ लिया | बुरा मत मानना दावे से कह सकता हूँ कि आपके कमरे में कोई नहीं था। भगवान करे आपको कोई बीमारी नहीं हो, वहम ही हो पर एक बार डॉक्टर को दिखाने में क्या हर्ज़ हैं
मैं हंसी... हा हा हा....कुछ वहम भी ज़िन्दगी को खुशियों भरते हैं , सुकून देते हैं.., अपनों से जोड़े रखते हैं तो उन्हें ज़िन्दा रखने में क्या हर्ज़ हैं ? और मैं वहाँ से चल दी.....!
इंदु उपाध्याय, पटना।
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