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तपती धरती नन्हे पग हैँ ।
माता पिता की जान हैँ ।
घर जाने को आँखे रोती ।
अब गाँव अपना प्रस्थान हैँ ।
तपती धरती ............
रस्ते पे चलके रस्ता ना सूझे।
ये जीवन की कैसी परीक्षा हैँ।
भूख , बीमारी ने सब छीना।
जीवन का सहारा भिक्षा हैँ ।
चलते जाना घर की आस मेंं ।
जब तक नन्हे पाँव मेंं जान हैँ ।
तपती धरती .............
रोटी चटनी थी गाँव की अच्छी।
बेकार ही चलके शहर मेंं आये।
खेतो मेंं था खेलता सा बचपन।
अब सारा शहर ही हमे भगाये।
निर्धन बच्चो की छीनी मुस्कान।
क्यां इसमे ही देश का मान हैँ ?
तपती धरती ..........
बेटी पूछे अब तो बता दो पापा।
कब तक हमे यूँ ही चलना हैँ।
भईया तो रस्ते मेंं मर ही गया।
अब भाग्य को कैसे बदलना हैँ।
विपदा के इस जलते समय मेंं।
नन्हो का जीवन परेशान हैँ ।
धरती तपती ...........
ड़ा0 मदन पाल बिरला ' ग़ज़ब '
देहरा दून , उत्तराखंड ।
मोबाइल -9760742412
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