लघु कथा-
तालियों की गड़गड़ाहट, चमक-दमक, लोगों की भीड़ के मध्य भी वह आज स्वयं को अकेला महसूस कर रहा था । उसका दर्द, ना जाने कब, शब्दों का रूप लेकर उसकी शोहरत की वजह बन चुका था। कितना अजीब है ना ,दर्द को छुपाते हुए, एक फीकी मुस्कान के साथ इस चकाचौंध भरे माहौल में स्वयं को स्थापित करना !
रह-रह कर यही विचार उसके मन में कौंध रहे थे । आखिरी ऐसी शोहरत किस काम की ? जहाँ उसके पास कहने को भी कोई अपना नहीं । अब वह उस दिशा में कदम रख चुका था, जहाँ से लौटना कठिन था ।स्वयं से लड़ते-लड़ते, वह अपने को इतना बदल चुका था कि उसकी वास्तविक छवि धूमिल हो चुकी थी । किसी रंगमंच के किरदार की भांति कठपुतली सा वह नाचता जा रहा था । इस शोहरत को पाने के लिए उसे क्या- क्या खोना पड़ा ? उसके सामने रह-रह कर बस यही ख्याल आ रहा था । वह जिस आसमान पर था, वहाँ उसे धरती का कोई छोर नजर नहीं आ रहा था । बस एक प्रश्न उसके मस्तक पटल पर दस्तक दे रहा था ...क्या सच में वह जिंदा है ? शायद हाँ या फिर नहीं ।
किरण बाला , चंडीगढ़।
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