बाबूजी- अमिता

लघुकथा


पोस्ट मैन डाक डालकर चला गया तब बाबू जी अहिज्स उठें और कांपते हाथों से डाक उठाई थी।पढ़ते ही वहीं जमीन पर बैठ गये थे।मां ने देखा बाबूजी पढते ही चिन्तित हो गये थे।अजी सुनते हो किसकी चिट्ठी हैं। बिटिया की, क्या लिखती हैं? सब ठीक तो है।कुछ बोलो तो पता चले। चिट्ठी हाथ में रखे सोच में चले गये थे‌।मां ने चिट्ठी हाथ से लेकर पढ़ना शुरू कर दी।सब अच्छा तो लिखा है। बिट्टू को याद कर रही हैं। छुट्टियों में बिट्टू को उसके पास भेज देंगे ।
               इतनी देर से चुप बैठे बाबू जी  चौंक पड़े नहीं ऐसी गलती कभी नहीं करना।पिछली बार जब बेटी के आने पर उसका उदास चेहरा बता रहा था कि  वह ससुराल में सुखी नहीं है।तब पूछने पर  रो पड़ी थी।बाबू जी ने ही कहा था कोई तकलीफ़ हो तो लिख देना नही तो बिट्टू याद आता है लिख देना तो मैं समझ जाऊंगा ‌कि तुम्हें कोई तकलीफ़ हैं।यह गुप्त मंत्रणा बाप बेटी की जिससे मां अनभिज्ञ थी।
               पिता ह्रदय बाबूजी समझ गये थे।मेरी अटैची भर देना कल ही जाकर लिवा लाता हूं।मां कुछ समझ पाती तब तक बाबूजी बाजार के ृलिऐ निकल गये थे।



अमिता मराठे
इन्दौर


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