जीवन में कुछ घटनाएं सोचने के लिए बाध्य कर देती है।जैसे ही मैंने समाचार पत्र खोला चंपू नाम देखते ही स्मृति रीवा जिले के गंगेव गांव में पहुंच गई थी। जहां मिस्टर तबादले के दौरान बैंक की एक नई शाखा का ओपनिंग करने पहुंचे थे। मुझे भी उनके साथ दो साल तक रहने का अवसर प्राप्त हुआ था।दो बेटे छोटे थे।चंपू आदिवासी किशोर था। हंसमुख, स्वस्थ,तेज बुध्दि का था ।सब सवालों के जवाब उसके पास तैयार रहंते थे। बैंक मेनेजर के घर पर उसका काम बच्चों की देखभाल तथा बैंक की सफाई का था। थोड़े दिनों में ही मेरे से हिलमिल गया था । हिन्दी भी सफाई से बोलने लगा था।
एक दिन वह समय पर आया नही। मैं भी बिना राह देखें काम में जुट गई थी।घर रीवा अलाहाबाद हाई वे पर बैंक के ऊपर ही था। गांव की बसेस बैंक के सामने ही रूकती थी।मैंने देखा बस स्टाप पर बहुत भीड़ थी। व्यर्थ में समय गंवाने के बजायअन्दर आकर काम में व्यस्त हो गई थी।चंपू को देरी से आने का कारण पूछने पर उसने कहा एक औरत ना बच्चा जनी हैं।मैं चौंक गई। सड़क पर। ,उसने कहा हां वह महिला अस्पताल जाने के लिए बस में बैठी थी दर्द के कारण चिल्ला रही थी तो बस वाले ने रास्ते में ही उतार दिया। गांव वालों ने घने पेड़ की छांव में ही लिटा दिया था। उसने खुश होकर कहा छोरा हुई। मैं सुनकर स्तब्ध हो गई । किन्तु वह सहज था।
गांव दस किलोमीटर दूर था। वहां से सड़क तक आने-जाने की सुविधा नहीं थी। इसलिए आदिवासी महिलाएं ही जो अनुभवी होती थी काम पूरा कर लेती थी।बाकी तकदीर के भरोसे चलता था।मैंने वहां के ठाकुर परिवार की महिलाओं से परिचय बढ़ाया तो पता चला कि अस्पताल में चेकअप के लिए या डिलेवरी के लिए जाने से शर्माति हैं।
चंपू एक दिन हांफते हुए आया मेरा हाथ पकड़ कर घर के पीछे सुनसान जगह पर ले गया। दृष्य़ देखते ही मैं हैरान हो गई।एक महिला छटपटा रहीं थीं।मुझे मेरे सोनू के नार्मल डिलेवरी की याद आ गई। नर्स डॉक्टर आसपास थे। यहां तों अकेली पड़ी थी ।चंपू ने दूर खड़ी कुछ बुजुर्ग महिलाओं कीओर इशारा किया और कहा ये सब करेंगी।आप पास में ना जाओ।
मैं लौट आई पर मेरा मन बेहद हलचल में था।दूसरे दिन ज़िला अस्पताल के परिचित डाक्टर से मुलाकात कर चर्चा की तब उन्होंने कहा बुजुर्ग महिलाएं यहां तक आने ही नहीं देती।और जो आ जाती है तो सही जानकारी नहीं देती कभी तो रात में ही बच्चा रख कर चली जाती है। डाॅक्टर ने ऐसे बच्चे दिखाये जिनकी मां पता नहीं किस डर से भाग गई थी।कई बार सरपंच से बातचीत की गई किन्तु इन आदिवासियों का। पूरा सहयोग नहीं मिलता है। मैं शाम को दूर तक एक घंटा चूमती थी।तब आसपास महिलाओं के साथ जुड़ने का प्रयास किया था।जब सफल हुई तो उन्हें अस्पताल का महत्व तथा पढ़ाई की आवश्यकता को समझाया था। समझदार महिलाओं के साथ मिलकर लघु उद्योग,जैसे आचार ,बड़ी ,पापड़ के बनाने की विधि समझाई व बना कर बेचना कैसे भी बताया था। आंवला जामुन आदि भरपूर होता था।मैंने भीआंवले का मुरब्बा आचार ,सुपारी,तथा मीठी सुपारी बनाना सिखाया था।आदिवासियों के साथ प्रेम बढ़ने लगा वैसे ही उस स्थान से हमारा तबादला हो गया।कुछ सालों तक समाचार मिलता रहा फिर सब बन्द हो गया था। यदाकदा कोई मिलता तो जिन्हें पढ़ा लिखाकर तैयार किया था वे माताएं बहनें नमस्कार कहतीं हैं। किन्तु चंपू के साथ गुजारे तीन साल भुलाये नहीं जाते।सभी कामों में वह मेरे साथ था।बाद में वह बैंक में चपरासी पद पर काम करने लगा था।
अमिता मराठे
इन्दौर
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