सावन-रूचिका

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बादल , बादल के पीछे चाँद ,
काली घटा छाई हैं ।
ये जो सावन की  बुंदे ,
ज़मीन से मिलने आई हैं ।


तेज़ हवाएं - रिमझिम बारिश ,
नया नवेला सावन आया ।
उमंग की लहरें ,
मन में ले रही अंगडाई हैं ।
ये जो सावन की  बुंदे ,
ज़मीन से मिलने आई हैं ।


इसी सावन में ,
तुम्हारा टकराना मुझसें ।
अनजान से दोस्ती तक का सफर ,
सारी यादें साथ लाई हैं ।
ये जो सावन की  बुंदे ,
ज़मीन से मिलने आई हैं ।


~ रूचिका शर्मा, देहरादून


 



 


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