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सावन स्वभाव से ही मस्ती भरा है। जब भी आता था रौनक छा जाती थी। सब खुश हो जाते थे, पर लोगों की तरह यह सावन का महीना भी कितना बदल गया है।सावन ने गीत, झूले,मस्ती,फुवारे,हरियाली,मेल-मिलाप व्रत-त्योहार सब को छोड़ दिया और एक व्यस्त एकल परिवार की तरह गुमसुम सा हो गया है। मुझे आज भी याद है जब हम छोटे थे तो सावन के महीने का बड़ी बेसब्री से से इंतजार करते थे।सावन के आते ही गांव की बहने और बुआएं अपने मायके आ जाती थी। पेड़ों पर झूले पड़ जाया करते थे। मंदिर में प्रतिदिन भजन कीर्तन होते थे और अखंड रामायण पाठ का भी आयोजन किया जाता था। सोमवार के दिन सुबह- सुबह सभी लड़कियां और महिलाएं पूजा की थाली हाथ में लेकर शिवालयों की ओर निकल पड़ती थी। गांव की लड़कियां और औरतें इकट्ठी होकर झूला झूलने जाती थी और आंगन में सावन के गीत गूंजते थे ।बच्चे पानी से भरे गड्ढे में नाव चला कर खुश होते थे। व्रत और त्यौहार आने पर रौनक चौगुनी हो जाया करती थी। आज बहुत याद आता है वह सावन,उसकी मस्तियां और उसका अपनापन। आप सब से हाथ जोड़कर निवेदन है कि यदि आपको मेरा वह सावन दिखे तो मुझे जरूर मिलवाना।
मनीषा शर्मा
628 तुलसी नगर इंदौर
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