एहसास-अमिता

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मैंने देखा वह सड़क पर चल रहा था।कभी ऊपर देखता कभी आजुबाजु।जानता हैं थकान का गाना गायेगा तो इम्तहान पास नहीं हो सकता। चलते रहने में ही जलते पैर शीतल महसूस हो रहे थे। सर पर बोझ उठाये कंधे पर भविष्य लटकाये
वह नंगे पैर तन पर चिथड़े हुए कपड़े थे। उसने बनाई अट्टालिका के प्राकार में बैठे मैं उसे देख रही थी‌।उसने कभी नहीं सोचा होगा कि ऐसा कोई वायरस आयेगा जो उसका सब कुछ छिन लेगा।पेट पर पैर रखकर ऐसा नाचेगा कि स्व का एहसास भी खामोश कर देगा।वह शहर छोड़कर जा रहा था । महामारी की भंयकर आहट से उसका ह्रदय व्यथित हो गया था।
          लोग भी इम्तहान दे रहे थे ।खामोश थे। भयभीत थे।अपने इंसान होने का एहसास भी भूल गये थे। इसीलिए उसे जाते हुए सिर्फ देख रहे थे।वह सोच रहा था ।अभी मैं मजबूर हूं। कल मेरा एहसास लौट आयेगा मैं मजबूत हूं ।ये ज़िन्दगी का सफ़र हैं । इस इम्तहान में पास तो होना ही है।यही उसके कौशल का जज्बा था जो वह चल रहा था।


अमिता मराठे
इन्दौर



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