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वो चाहते हैं कि मैं बनी रहूँ
बस यूँही लकीर की फकीर
सदैव ही नतमस्तक रहूँ
पहने रहूंँ रूढ़िवादिता की जंजीर
आँखों को अपनी मूँद लू
अन्याय अनीति के विपरीत
कूप के मेंढ़क सम जान लूँ
बस इसे ही भाग्य की लकीर
किंतु जबकि मैं जानती हूँ
अपनी खींची आड़ी -तिरछी लकीर
जब एक-एक पन्नों पर उतारती हूंँ
तो जाग उठता है सोया ज़मीर
और फिर सोचने सी लगती हूँ
बेतरतीब सी खींची गई ये लकीर
जिनके ज़रिए मैं बदल सकती हूँ
न जाने कितनों की कितनी लकीर
----किरण बाला
(चण्डीगढ़)
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