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झूम कर ये नाचती हवा है।
गगन उसके संग उड़ चला है।।
दरख़्त भी नशीले हुए हैं।
हवाओं संग लचीले हुए हैं।।
वो सांय-सांय करने लगे हैं।
हिल मिल कर हंसने लगे हैं।।
इक जुनून सब ओर छा गया है।
किल्लोल का मजा आ गया है।।
उमड़-घुमड़ मेघ रक्तिम हुए हैं।
प्रिय आसक्ति में मदरिम हुए हैं
चहुंदिश भाग रही पुरवाई है।
अवनि-अंबर धूल महकाई है।।
वल खातीं ये नदियां सारी हैं।
उल्फुलात जल में वारी है।।
टर्र-टर्रावत दादुर बोल रहा है।
झींगा उचक-उचक मुँह खोला हैं।।
खुशबू सोंधी माटी की आई है।
खेतों ने हरियाली विखराई है।।
बच्चों की टोली मस्ती में आई है।
करते - किल्लोल धूम मचाई है।।
प्रफुल्लित मन फूटी जवानी है।
अरमानों की यूँ छाई रवानी है।।
प्रिय डराता मन सावन आया है।
राखी ने प्रिय से विलगाया है।।
साज श्रृंगार गोरी समेट रही है।
मैका प्रेम-प्रीत की डोर रही है।।
लिए हुलास आई ये वर्षा रानी है।
सावन की करती अगवानी है।।
धूप तेज अब नहीं सताती है।
मध्यम आँच प्रीत की लगाती है।।
चुहल करते सब देवर भाभी हैं।
प्रीत का गीत वर्षा गाती आती है।।
रेखा दुबे
तिरूपति पैलसे विदिशा मध्यप्रदेश
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