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सावन के दिन आए सखी
ऋतु पावस मोहे भाये
चातक मोर पपीहा देख सखी
पीहू पीहू शोर मचाए।
रिमझिम रिमझिम पड़ी फुहारें
बदरा भी गरजाए।
चपला की चमचम से मेरा
मनवा डर डर जाए।
ताल तलैया पूरित होकर
उफन उफन हरसाय।
हरित चुनरिया ओढ़ वसुंधरा
मंद मंद मुस्काए।
अमवा की डाली पर सखियां
झूलत कजरी गायें।
राग मल्हार को छेड़े प्रियतम
मिले बिन रहा न जाए।
देख सखी सावन के दिन आए
संध्या तिवारी
विदिशा मध्य प्रदेश
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