मंजिलों की आस-संध्‍या तिवारी

 आप का इस बेवसाइट पर स्‍वागत है।  साहित्‍य सरोज पेज को फालो करें(  https://www.facebook.com/sarojsahitya.page/
चैनल को सस्‍क्राइब कर हमारा सहयोग करें https://www.youtube.com/channe /UCE60c5a0FTPbIY1SseRpnsA


भाग रहा प्रार्थी
हाँफ रहा सार्थी
जिंदगी की कशमकश
मानवता पुकारती।


आग पेट की बड़ी
कुल बुला रही खड़ी
तप रहा है भास्कर
जेठ माह ताप पर
वसुंधरा की गोद भी
आग ही उगल रही
पांव खाल जल गई
देह भी झुलस गई।


थकी थकी सी चाल है
पूछता है कौन यहाँ
कैसा किसका हाल है?
 बस मंजिलों की आस में
झेलता  संताप है।


शहर शहर गांव में
उसके घर की छांह है


दर्द की मल्हम लिए
अपनों का एक भाव है
एक यही ख्वाब ले
घर की ओर बढ़ रहा
मंजिलों की आस में
अपने पथ पर चल रहा।


संध्या तिवारी
विदिशा



एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ