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पुण्य उदय हम सबका है,
गुरुवर के युग में जन्मे हम,
ज्ञान दिवाकर कहते जिसको,
उन श्री चरणों में वंदन।
कलम स्वयं ही चल पड़ती है,
गुरुवर का ध्यान लगाने से,
शब्दों के मोती झड़ते हैं,
भगवन की महिमा गाने से।
तेज ललाट पर ऐसे चमके,
सूर्य किरण को धुंधला दे,
मधुर वाणी जब मुख से निकले,
अमृत को भी झुठला दे।
गुरुत्वाकर्षण क्या धरती में होगा,
मंद मुस्कान में जो सम्मोहन,
दर्शन इनके पाने को,
मीलों से आते हैं जन जन।
एक झलक पाने को कैसे,
व्याकुल होता सब का मन
दर्शन पाकर लगता जैसे,
जन्मों के कटते बंधन।
स्वरचित
अनुभा जैन
विदिशा म प्र
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