पौराणिक कथा
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एक विशाल बट वृक्ष था। उस वृक्ष पर कई पक्षियों का बसेरा था। कई पथिक उस वृक्ष की छांव में आश्रय पाते थे। एक दिन प्राकृतिक आपदा बिजली बन कर आई और उस वृक्ष पर गिर गई। वृक्ष सूख गया।
उस वृक्ष पर आश्रय पाने वाले सभी पक्षी उड़ गए किंतु एक धर्मात्मा तोता उस वृक्ष के कोटर मैं अपना बसेरा छोड़ कर कहीं नहीं गया। वह तोता धीरे धीरे कमजोर होने लगा। उस वृक्ष पर उसे दाना पानी नहीं मिलता था। धीरे धीरे वह तोता मृत्यु के नजदीक आ गया। उसकी ऐसी हालत देखकर भगवान इंद्र को उस पर दया आ गई। बे उस तोते के पास आए और बोले जंगल में इतने सारे पेड़ हैं तुम उन पर क्यों नहीं अपना आश्रय बना लेते हो। ""तुम्हारी कैसी हालत हो गई है फिर भी इस सूखे पेड़ पर बसेरा कर रहे हो।"" तोता बोला "इस पेड़ ने बचपन से मुझे आश्रय दिया सर्दी गर्मी धूप बारिश में इसने मुझे आपदाओं से बचाया। मेरे हर संकट में इसने मेरा साथ दिया और आज जब इस पर संकट पड़ा है तो मैं इसे कैसे छोड़ दूं। यदि किसी ने हमें सुख में साथ दिया है तो हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम उसे दुख में छोड़कर चले जाएं।" हे देवता जब तक मुझ में प्राण रहेंगे मैं इस वृक्ष को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा। क्योंकि यह मेरे सुख दुख का साथी है।"
तोते की कर्तव्य परायणता और कृतज्ञता को देखकर इंद्रदेव प्रसन्न हो गए। बे बोले मैं तुम पर प्रसन्न हूं मांगो तुम क्या मांगते हो।? "तोता बोला हे स्वामी देना है तो इस पेड़ को पुनः जीवन दे दो इसे फिर से हरा भरा कर दो"।
इंद्रदेव ने उस पेड़ पर अमृत वर्षा करके उसे पुनः नया जीवन दे दिया। पहले की ही तरह वह पेड़ हरा भरा और सुंदर हो गया।
संध्या तिवारी
विदिशा मध्य प्रदेश
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