मन को पीड़ा-सरस्वती उनियाल

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यू बच्चों का स्वयं, ,
चिर निंद्रा में जाना, 
हृदय द्रवित कर जाता है ,
मन को पीड़ा पहुंचाता है। 
क्यों इतने कमजोर हो गए ,
कुछ समझ नहीं आता है। 


जीने की ललक और हौसला ,
जाने क्यों खो जाता है? 
उठाते हैं आत्मघाती कदम, 
ऐसा क्या हो जाता है ?


मां बाप का प्यार ,
भाई बहन का चेहरा ,
कोई कैसे भूल जाता है? 
छोड़कर सारी दुनिया, 
क्यों फंदे में झूल जाता है? 


पल पल जीते तुम्हें देख कर ,
तुम बिन कैसे जी पाएंगे? 
जीना मजबूरी होगी, 
जीते जी वो मर जाएंगे ।


ये सब पुनरावृत्ति ना हो, 
इसके लिए हमको आगे आना होगा। 
 जीवन है अनमोल, 
ये सब को समझाना होगा ।


करना है चुनौतियों हेतु तैयार, 
 यह हमको भी समझना होगा, 
शारीरिक मजबूती के साथ ,
मानसिक मजबूत भी करना होगा। 


किताबी ज्ञान सब कुछ नहीं ,
उससे बड़ा जीवन का मोल। 
बच्चों को जीना सिखलाएं, 
क्योंकि जीवन है अनमोल। 
 
याद रखें समस्या अगर है ,
तो समाधान भी उसका होगा। 
माता-पिता परिवार के खातिर, 
तुम्हे हर हाल में जीना होगा, 
 तुम्हें हर हाल में जीना ही होगा। 


 सर्वथा मौलिक,स्वरचित व अप्रकाशित रचना 


सरस्वती उनियाल, 
डाकपत्थर ,विकासनगर ,देहरादून, 
 उत्तराखंड


 



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