पश्चाताप-राजश्री राठी

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 मरे से घुसुर फुसुर  की ध्वनि सुन रितु के कानों में जैसे गरम तेल उतर आया ,पैर जड़वत हो गए ,पलके कोरो तक डबडबा गई । आज  स्वयं को कितना बेबस ,लाचार अनुभव कर रही थी ।  पश्चाताप की अग्नि में उसकी आत्मा धधक रही थी । जिस घर को वह अपना मान रही थी वह सात फेरो के साथ ही पराया हो चुका था ।  "काश , काश ! क्रोध के उन पलों को वह स्वयं पर हावी ना होने देती  तो आज इस अपमान से तो बच पाती ।" शायद यही वजह रही होगी बेटी को पराया धन कहकर बार बार उसके स्थान से  आगाह करा दीया जाता है ।अभी दस  ही तो दिन हुए थे उसे ऋषभ के साथ यहां आए । मात्र दस दिनों में ही वह सभी के व्यवहार में आया परिवर्तन भांप चुकी थी । जो दादी हरपल उसे सिर पर बिठाए रखती  वह भी बातो बातो में कितनी ही बार कह चुकी थी ,बेटी तो मायके में चार दिन ही अच्छी लगती है । 
आज जब भाभी भैया से कह रही थी , " दीदी को तो आदत है तिल का ताड़ बनाने की " यह सुन अब यहां रहना उसे दूभर हो गया किंतु स्वाभिमान खुशियों के रास्ते में चट्टान जैसे  खड़ा  था  । आखिर विचारो के मंथन का हल निकल आया । उसके अंतर्मन से आवाज आयी , रिश्ता तो दोनों का था उसे बचाने की पहल  चाहे कोई भी करे उस से क्या फर्क पड़ता है ।
"जब हवा चलती है तो जलते दिए को हथेलियों का सहारा मिल जाए तो हथेलियों को गरमाहट मिलती है , लेकिन दिया तो बुझने से बच जाता है । तभी मां ने उसके कंधो को थपथपाते हुए कहा बेटी गलती होने पर क्षमा मांगने से आत्मसम्मान घटता नहीं बल्कि बढ़ जाता है , " बेटी तुम्हारी मंजिल तुम्हारा इंतजार कर रही है ।" 
आज रितु यह तो समझ चुकी थी कोई भी निर्णय लेने से पहले उसके तह तक पहुंच जाना चाहिए , वरना पश्चाताप की अग्नि में जलने के अलावा शेष कुछ नहीं रहता ।
                                     


राजश्री राठी 
 " श्री " मोबाइल 9823528481
गौरक्षण रोड  , श्रद्धा
अकोला ( महाराष्ट्र ) 
 e-mail id _ rathirajshree85@gmail.com


 



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