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सूखी पड़ी जमीं पर जब बरसता सावन।
पायल सी बजती बूंदे बजे गीत मनभावन।।
हरियाली चुनर ओढ़े, सब बाग और बगीचे।
श्रंगार कर के बैठी धरती गगन के नीचे।।
नाचे ये मन मयूरा, आएगा प्रियतम मेरा।
मन सोच के ही झूमे, शरमाए हिया मेरा।।
सतरंगी सावन छेड़े, खुशियों से मन ये हरषे।
सूझे न कुछ मुझे अब, मन काहे मेरा तरसे।।
अमुआ पड़े हैं झूले, तुम राह तो न भूले।
सावन का ही था वादा, हम तुमको नहीं भूले।।
तन को भिगोती बूंदें, मनभाव सरिता बहती।
पलके बिछी हैं राहें मेरी कविता कहती।।
नीता चतुर्वेदी
विदिशा मध्य प्रदेश
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