अपना भविष्य संवारने और सपने को सच करने की चाह में रोहन और रंजना ने घर त्याग तो कर दिया था,पर अब कहां जाएं,इसी की फ़िक्र सताए जा रही थी।रोहन जहां पढ़-लिखकर आई ए एस आफिसर बनना चाहता था, वहीं रंजना की भी चाह एक आई पी एस आफिसर बनने की थी। रोहित जहां सुदूर गांव का एक किसान का लड़का था, वहीं रंजना एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की थी। रंजना के घरवाले उसकी शादी करना चाहते थे पर उसकी इच्छा आई पी एस आफिसर बनने की थी, अतः न चाहते हुए भी घरवालों से रिश्ता तोड़कर वह घर छोड़कर भाग निकली थी।पर अब वह कहां जाएं,इसका उसे पता नहीं था। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म के बेंच पर बैठकर वह अपना किताब निकालकर पढ़ रही थी, तभी वहां रोहन आया और उसी बेंच पर दूसरी ओर बैठकर वह भी अपना किताब निकालकर पढ़ने लगा।दोपहर से शाम और अब अंधेरा भी होने लगा था। तभी बत्ती गुल हो गई। हिम्मत करके रोहन ने रंजना से पूछा - "आपका क्या नाम है, और आप कहां जाना है? आपकी ट्रेन कब है? " यह सब सुनकर पहले तो रंजना चुप रही,पर अचानक रोते हुए बोली -"मैं एक अभागन हूं।मेरा कोई ठौर-ठिकाना नहीं है। मुझे यह भी पता नहीं कि कहां जाना है।बस मैं इतना जानती हूं कि मुझे एक आई पी एस आफिसर बनना है। मेरे घरवाले मेरी शादी करना चाहते हैं। इसलिए मैं घर से चली आई हूं।" एक ही सांस में रंजना ने रोते हुए अपनी व्यथा सुनाई।
यह सुनकर हिम्मत बंधाते हुए रोहन बोला -" घबराइए मत। कहते हैं कि जहां चाह वहां राह। मेरी भी हालत कुछ अलग नहीं है। मैं एक गरीब किसान का बेटा हूं।पर मैं एक आई ए एस आफिसर बनना चाहता हूं। रिश्तेदारों के दबाव में आकर मेरे पिताजी मेरी शादी करना चाहते हैं। इसलिए मैं घर से निकल भागा हूं।""अब आप कहां जाएंगे " रोहन की ओर देखते हुए रंजना ने कहा।अब वह सहज हो चुकी थी। "जाऊंगा कहां, यही स्टेशन पर रात पढूंगा और सो जाऊंगा।दिन में कुछ काम करूंगा, जिससे अपना खर्च निकाल सकूं।" "फिर तो मुझे भी अपना साथी बना दिजिए।" रंजना ने कहा।"मैं अपने और आपके लिए खाना बना दिया करूंगी।दिन में ट्रेन के यात्रियों को पानी पिलाकर कुछ पैसे कमा लूंगी। मैं आप पर बोझ नहीं रहूंगी।बस मुझे आई पी एस आफिसर बनने में मेरा सहयोग किजिए।""हां, हां, क्यों नहीं।हम दोनों एक ही रास्ते के राही है।"फिर रोहन ने अपने बैग से कुछ फल निकाला और स्वयं भी खाया और रंजना को भी खाने को दिया।उसी बेंच पर एक दूसरे की ओर पीठ करके दोनों उस रात अपने भावी सपने को पाने की योजना बनाने लगे।
*मुकेश कुमार दुबे "दुर्लभ"*
शिक्षक सह साहित्यकार, सिवान (बिहार)
95765 35097

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