तहखाने का रहस्य-किरण बाला

  साहित्य सरोज साप्ताहिक कार्यक्रम क्रमांक 01 कार्यक्रम:- जासूसी, रहस्‍य, रोमांच की कहानी

उस दिन शाम कुछ जल्दी अँधेरा होने लगा था। 10 साल की छोटी सी लड़की अनु को अचानक याद आया …
“अरे! मेरी विज्ञान की कॉपी तो विभा के पास रह गई!”

उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।

माँ की डाँट, पापा की सख़्त आवाज़ , ये सब ख्याल एक साथ उसके मन में  आने लगे।

“ मुझे तो उसमें काम भी करना था ,अगर कल कॉपी चेक हुई तो…?”


डर के मारे उसने किसी को कुछ नहीं बताया और चुपचाप घर से निकल पड़ी।विभा का घर रामलीला ग्राउंड के पास एक बड़ी सी बिल्डिंग में था, जिसमें बहुत से घर थे । लेकिन उसी बिल्डिंग से सटा हुआ  एक सुनसान घर भी था जिसे सब “भूत घर” कहते थे। दिन में भी लोग तेजी से उस घर के पास से निकलते थे।विभा की बिल्डिंग का मुख्य दरवाजा भी इसी वजह से जल्दी ही बंद हो जाता था। रात को तो उस घर की तरफ कोई देखता भी नहीं था। सालों से वहाँ कोई भी रहने नहीं आया। लोगों के अनुसार लगभग 30 वर्ष पहले इसमें जो परिवार रहता था उनकी किसी ने गोली मार कर हत्या की थी। कभी -कभी रात में वहाँ से आवाज़ें आती हैं।अनु ने  पहले कभी  इस पर ध्यान नहीं दिया था, पर आज न जाने क्यों उसके कदम अपने आप धीमे हो गए। जब वह बिल्डिंग के पास पहुँची तो उसका दिल और ज़ोर से धड़कने लगा। मेन गेट बंद था और चौकीदार अंकल  भी वहाँ पर नहीं थे। उसने मन ही मन कहा,”काश! मुझे कॉपी याद ही न आई होती और मुझे ऐसे न आना पड़ता।” चारों तरफ अजीब सी खामोशी थी।उसने हिम्मत करके आवाज़ लगाई, “विभा… विभा…”  परन्तु कोई जवाब नहीं आया। उसने दरवाज़े को ज़ोर-ज़ोर से हिलाया ताकि आवाज़ सुनकर कोई आ जाए। धातु की आवाज़ पल भर में ही अँधेरे में गूँज उठी।

उसने भूतों की कहानियाँ बहुत सुनी थीं। दादी की कहानियाँ जिनमें सुनसान घरों में परछाइयाँ चलती थीं। पड़ोस के बच्चों की बातें ,जहाँ आधी रात को कोई नाम लेकर बुलाता था और टीवी पर देखे हुए वो  डरावने दृश्य जहाँ डर पहले मन में जन्म लेता है और फिर आँखों को धोखा देता है। तभी…उसे लगा जैसे कोई पीछे खड़ा है। उसके भीतर जमा सारी भूतों की कहानियाँ एक साथ जाग उठीं। “भूत पीछे से आते हैं…” “वे कदमों की आवाज़ सुनते हैं…” किसी का भी रूप के  लेते हैं… उसकी साँस तेज़ हो गई। किसी के चलने की आवाज़ आई। लेकिन कदम दिखाई नहीं दिए। उसने पलटकर देखा तो  कोई  भी नहीं था । किंतु अचानक… उसे लगा कि उसके पीछे कोई खड़ा है।अनु की साँस अटक गई। धीरे-धीरे एक ठंडी हवा उसके कानों के पास से शू …. करके गुज़री। उसके कंधे पर किसी ने हल्का सा हाथ रखा। अनु ने चीख़ना चाहा…..पर आवाज़ गले में ही अटक गई। काँपते हुए उसने पीछे मुड़कर देखा वहाँ  कोई नहीं था। लेकिन…भूत घर की खिड़की अपने आप खुल रही थी। चर्र र्र…  तभी अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आई। छप्प… छप्प… मानो कोई पानी में कूदने की कोशिश कर रहा हो। अनु की आँखों से आँसू बहने लगे।उसने पूरी ताक़त से भागना शुरू किया।लेकिन डर में वो गलत दिशा में दौड़ने लगी। वह रास्ता उसे सड़क की ओर नहीं ले गया, बल्कि एक सुरंगनुमा गली की तरफ ले गया जिसकी छत ऊपर से जर्जर थी ,दीवारों पर सीलन  थी जिसमें से नमी की दुर्गंध आ रही थी। पर पीछे से किसी ने उसका नाम लिया “अनु…” वह आवाज़ बिल्कुल उसकी माँ जैसी थी । लेकिन उसमें कोई अपनापन नहीं था।
उसने वहीं पर रुकना चाहा किंतु वह इतना भयभीत थी कि सुरंग में घुस गई। अंदर उसके कदमों की आवाज़ दस गुना लौटकर आ रही थी। उसे लगा जैसे उसके अलावा कोई और भी चल रहा है।उसने मुड़कर देखा तो वो उसकी ही परछाई थी।तभी सुरंग की दीवार पर किसी ने नाखूनों से खरोंच मारी। किर्र… किर्र… उसने आँखें बंद कर लीं और दौड़ पड़ी। वह सुरंग से भागती चली गई और अचानक सुरंग खत्म हो गई।उसके सामने ऊपर जाती हुईं पत्थर की सीढ़ियाँ थीं ।एक… दो… दस…गिनते-गिनते  उसकी साँस फूल गई।सीढ़ियाँ जैसे ख़त्म ही नहीं हो रही थीं।सौ से भी ज़्यादा सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद वह ऊपर पहुँची वहाँ एक पुराना शिव मंदिर था।घंटी अपने आप बज रही थी।टन… टन…जबकि आसपास कोई नहीं था।मंदिर के भीतर जाने की हिम्मत उसमें नहीं थी  लेकिन उसकी नज़र पीछे की ओर गई।

मंदिर के पीछे से नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ दिखाई दे रहीं थी। नीचे की तरफ कुछ तहखाने जैसा दिखाई दे रहा था।

उसका मन उसे रोक रहा था कि “मत जा!”पर कदम अपने आप  उस दिशा में चल पड़े थे। नीचे उतरते ही हवा बदल गई। कुछ ठंडी और भारी सी। उसे लगा जैसे जैसे किसी ने  उसकी साँस रोक रखी हो।नीचे छोटे-छोटे कमरे बने थे।हर कमरे में दीपक जल रहे थे।और वहाँ भस्म लगाए कुछ लोग मंत्र बुदबुदा रहे थे।उनकी आँखें बंद थीं, लेकिन उसे लगा कि वे सब उसे देख रहे हैं। तभी उनमें से एक ने आँख खोली। उसकी आँखें सामान्य नहीं थीं। उसने ज़मीन पर भस्म से कुछ लिखा।अनु पढ़ नहीं पाई, पर उसका मतलब उसके मन तक पहुँच गया। उसे लगा कि यहाँ कोई अनहोनी होने वाली है। उसके कानों में ढोल जैसी आवाज़ गूँजने लगी। ढम… ढम…ढम अनु चीख़ी और वहाँ से भागी। पर रास्ता वही नहीं रहा जिससे वह आई थी। अब वह जगह भूल-भुलैया बन चुकी थी। गलियाँ मुड़ती थीं, दीवारें घूमती थीं, और हर मोड़ पर उसे लगता कोई  उसके पीछे है। वह अब इतना डर गई थी कि उसकी आवाज भी नहीं निकल रही थी। अब उसमें इतनी हिम्मत भी नहीं थी कि आगे एक कदम भी चल सके। न चाहते हुए भी  वह चले जा रही थी। कभी उसे  किसी के हँसने जैसी आवाज़  सुनाई पड़ रही थी तो कभी किसी के रोने की। अचानक उसका पैर किसी चीज़ से टकराया और वह गिर गई।अब उसे  चारों ओर रोशनी दिखाई दे रही थी। सुरंग, घर, बिल्डिंग का दरवाजा सब कुछ पहले जैसा ही था। तभी पीछे से आवाज़ आई,“अनु!”वह  आवाज़ चौकीदार की थी । उसने डरते हुए उस आवाज़ की तरफ देखा तो उसे उनके  साथ विभा भी दिखाई दी।“तू यहाँ क्या कर रही है?”अनु कुछ बोल नहीं पाई। बिना पीछे देखे रोते हुए वह घर पहुँचीऔर दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर लिया।उस रात वह कॉपी के बारे में भूल गई।

 उसका तेज़ बुखार देखकर उसकी माँ ने डॉक्टर को दिखाया तो डॉक्टर ने कहा, “बहुत डर गई है, बस।”लेकिन अनु जानती थी जो उसने देखा वह सिर्फ़ डर नहीं था। उस रात नींद में भी वह सीढ़ियाँ चढ़ती रही…उतरती रही…उसने सपने में देखा कि सुरंग के उस पार कोई मुस्कुरा रहा था। लेकिन अगली सुबह जब उसने अपना स्कूल बैग खोला तो विज्ञान की कॉपी अंदर रखी थी। जैसे ही उसने  पहला पन्ना खोला तो देखा   उसमें जो अक्षर लिखे हुए थे वो उसके अपने  नहीं थे। उस पर भस्म से लिखा था,  अकेले बाहर नहीं निकलना चाहिए , जो डर से भागता है वो ही यहाँ पहुँचता है।”  आज भी रामलीला ग्राउंड के पास वह सुरंग  और मंदिर है। लेकिन कोई नीचे नहीं जाता  क्योंकि कुछ  रास्ते खास लोगों के लिए ही खुलते हैं।सुरंग, सीढ़ियाँ और तहखाने का रहस्य आज भी लोगों की समझ से परे है।

किरण बाला (चण्डीगढ़)



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