विवाह की वर्षगांठ की तिथि पर एक पल का ही कार्यक्रम/आयोजन ऐसा आयोजन है जिसमें दो पहियों का रहना अति आवश्यक है। दोनों में एक पहिया भी न रहे तो यह तिथि एक कष्टदायक तिथि बनकर रह जाती है। पति-पत्नी के संबंधों में जिस्मानी रिश्ता उम्र के एक पड़ाव पर तो खूबसूरत होता है, लेकिन समय के साथ यह आकर्षण लुप्त हो जाता है, बिस्तर अलग हो जाते हैं, परंतु यह रिश्ता एक ऐसे रिश्ते में बदल जाता है जहाँ एक-दूसरे के नहीं होने की कल्पना मात्र से ही एक डर पैदा होने लगता है। साथी के न होने से जीवन ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद भी दिल की बातें करने को तरस जाता है। छोटी-से-छोटी जरूरत को खुद पूरा करना पड़ता है। उसकी चिंता करने वाला कोई नहीं। साथी यदि बिस्तर पर भी है तो भी एक-दूसरे की सुख-सुविधा का ख्याल रखता है।
उम्र के युवा पड़ाव पर दो अंजानों के बीच शुरू हुआ सफर पहले के दशकों में आसान नहीं होता था। पहरे थे, बड़ों से ही नहीं, छोटों से भी लाज थी, शर्म थी, जिम्मेदारियों का बोझ, संसाधनों का अभाव जीवन को एक कठिन रास्ते पर ले जाता था, फिर भी रिश्ता स्वस्थ था, सुखी था। एक-से-एक विवादों को आसानी से संयुक्त परिवार हल कर देता था। लाख झगड़े हो जाएँ, लेकिन यदि जीवन-साथी को छींक भी आ जाए तो देवी-देवताओं के आगे मन्नत की कतार लग जाती थी। सेवा में दिन-रात एक हो जाता था। लाख परेशानी होती थी, विवाद होता था, मगर जुदा उन्हें मृत्यु ही करती थी। उसके सिवा कोई उन्हें अलग नहीं कर पाता था। पति-पत्नी के बीच का रिश्ता ऐसा रिश्ता है जिसके आगे मर्यादा, मान-सम्मान, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, परतंत्रता जैसे सारे शब्द गौण रहते थे। रहता था तो केवल हँसी-मज़ाक, चुहल, शैतानियाँ। दोनों तरफ के समर्पण की देन होती थी कि विवाह सालों-साल चला करते थे। कमाई कम, मेहनत अधिक मगर समर्पण। एक-दूसरे के साथ हँसकर, खुलकर तभी बोल पाते थे जब कभी सफर में होते या किसी आयोजन में होते।
यदि किसी कारण विवाद और दूरियाँ बढ़ भी जातीं तो वह बंद कमरे से बाहर नहीं आती थीं और आ भी गईं तो पति-पत्नी दोनों अपने परिवार, भाई-बहनों का भविष्य देखकर, उनके विवाह में होने वाली दिक्कतों को देखकर चुप रहते हुए, सब सहते हुए जीवन का निर्वाह करते थे। तलाक या विवाह-विच्छेद की तो बात भी नहीं सोची जा सकती थी। यह हम नहीं कह रहे हैं, आज आपको अपने समाज में दर्जनों उदाहरण मिल जाएँगे।
लेकिन जैसे-जैसे हम शिक्षित होते जा रहे हैं, हमारी सोच बदल रही है। आज हालात बदल चुके हैं। विवाह बराबरी, मान-सम्मान, अहंकार, आदान-प्रदान, प्रतिष्ठा के युद्ध का मैदान बनकर रह गया है। बराबरी और हक की लड़ाई में प्रेम, चाहत और समर्पण का कहीं स्थान ही नहीं रह गया है। जहाँ सुई का स्थान नहीं था वहाँ तलवारें आ रही हैं। स्त्री हो या पुरुष दोनों के स्वाभिमान टकरा रहे हैं और न बड़ों की सुनना, न परिवार की मानना—बस अपने को श्रेष्ठ साबित करना। यही कारण है कि अब विवाह साल-दो साल से अधिक नहीं चल रहे हैं। विवाह की वर्षगांठ चार-पाँच वर्षों के बाद केवल कोर्ट के पेपरों में दर्ज हो रही है। जिंदगी बर्बाद होने का रोना रोया जा रहा है। दोनों पक्ष यह नहीं समझने को तैयार हैं कि उनके इस करतूत की सज़ा उनका परिवार भोग रहा है, उनके कुंवारे भाई-बहन भोग रहे हैं। वे तो केवल संबंध-विच्छेद या बिना रिश्ता समाप्त किए अलग-अलग रह रहे हैं। वे यह नहीं समझ रहे हैं कि इस अलगाव का कितना बड़ा असर उनकी जिंदगी, उनके मन पर पड़ रहा है। इस अलगाव का कितना खामियाजा उनका तन भोग रहा है।
वे तो बस वर्तमान में अहंकार की ओट में जी रहे हैं। वे आने वाले उस कल को नहीं देख रहे हैं जब उनकी हड्डियों में आज जैसी जान नहीं होगी। बंद कमरे में घुटन एवं एकांतवास की जिंदगी किस प्रकार कष्टदायक होती है, इसकी कल्पना वे झूठे अहंकार और स्वाभिमान में नहीं कर पा रहे हैं। वे विवाह को तन की जरूरत मानकर खुद को इससे ऊपर मानकर जी रहे हैं, लेकिन वे यह भूल गए हैं कि जो प्रकृति ने बनाया है उसके विपरीत जाने पर या पूर्ति न होने पर उनका तन और मन दोनों विक्षिप्त हो जाता है। विवाह के बाद पुरुष हो या महिला यदि एकांतवास में है तो समाज के सवालों के घेरे में है, परिवार की दया पर है। उसकी आवश्यकता पूरी हो रही है तो परिवार का प्यार कम, मजबूरी अधिक है—लेकिन यह भी तब तक, जब तक माता-पिता जीवित हैं।
अखंड गहमरी 9451647845

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