कल्पवास : अंतर्मन की यात्रा
पात्र परिचय
सूत्रधार
वृद्ध कल्पवासी (श्वेत वस्त्र, शांत और अनुभवी)
नव कल्पवासी (भगवा वस्त्र, पहली बार कल्पवास में)
गृहस्थ पुरुष (आधुनिक सोच वाला)
गृहस्थ स्त्री ( संवेदनशील, जिज्ञासु)
अन्य कल्पवासी (समूह)
दृश्य विन्यास
(मंच पर नदी का किनारा । बीच में एक हवन कुंड जिसके चारों ओर भगवा और सफेद रंग के कपड़े पहने हुए स्त्री-पुरुष बैठे हुए हैं । पीछे तंबुओं की पंक्तियों में लोग नित्यकर्म में लगे हैं तो कुछ लोग जल में स्नान करते हुए दिखाई दे रहे हैं। वातावरण में प्रातःकालीन शांति है और पीछे से भजन और कीर्तन की मद्धम ध्वनि सुनाई दे रही है।
सूत्रधार: (धीमे, गंभीर स्वर में)
यह न तो कोई साधारण तट है और न ही कोई साधारण मेला।
यह तो है माघ मास का संगम , जहाँ लोग एक महीने के लिए अपने घर को छोड़कर स्वयं की खोज में निकलते हैं।
अपना नाम, पद प्रतिष्ठा और अहंकार को त्याग कर एक सन्यासी की भांति रहते हैं।
आज यहाँ एक जिज्ञासा जन्म ले रही है।
एक नव कल्पवासी अपने प्रश्नों के साथ खड़ा है।
(वृद्ध कल्पवासी अग्नि के पास ध्यान में बैठे हैं । उनके पास एक नव कल्पवासी भगवा वस्त्र में संकोच से हाथ जोड़कर खड़ा है)
नव कल्पवासी: (विनम्रता से)
बाबा, मैं पहली बार कल्पवास में आया हूँ। मेरे लिए यहाँ सब कुछ नया है। यहाँ सभी ने सफेद, भगवा या फिर साधारण वस्त्र धारण किए हुए हैं। क्या इसके पीछे भी कोई कारण है ?
वृद्ध कल्पवासी:(मुस्कुराकर)
बेटा ! प्रश्न अच्छा है । कल्पवास को समझना इतना सरल नहीं है क्योंकि कल्पवास पूछते-पूछते ही समझा जाता है।
गृहस्थ पुरुष: क्या हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी इसका वर्णन आता है?
वृद्ध कल्पवासी : ( गंभीरता से उसकी ओर देखते हुए )
हाँ, हमारे पुराण भी इस बात की पुष्टि करते हैं।
मत्स्य पुराण कहता है कि कल्पवासी को श्वेत, स्वच्छ, सादे वस्त्र धारण करने चाहिएं क्योंकि श्वेत रंग मन की शुद्ध और स्थिर करना सिखाता है।
पद्म पुराण के अनुसार कल्पवासी के
वस्त्र ऐसे हों जो इंद्रियों को विचलित न करें क्योंकि अलंकरण, चमक-दमक से दूरी संयम रखने में मदद करती है।
स्कंद पुराण में भी कल्पवासी को सफेद हल्का गेरुआ रंग पहनने के लिए कहा गया है। इसके अतिरिक्त आभूषण, श्रृंगार, सुगंध आदि भी वर्जित हैं।
नव कल्पवासी: (अपना भगवा वस्त्र देखकर)
तो बाबा, मेरा भगवा पहनना भी तो सही
है न?
वृद्ध कल्पवासी: (स्नेह से)
भगवा वैराग्य का संकेत है। पर यह भी याद रखने योग्य है कि वस्त्र संकेत मात्र हैं, साधना नहीं।
यदि मन में दिखावा न हो तो श्वेत हो या गेरुआ या फिर साधारण वस्त्र सभी पहने जा सकते हैं।वस्त्र बदलना आसान है, किंतु विचार बदलना नहीं।
(गृहस्थ स्त्री आगे आती है)
गृहस्थ स्त्री: आपने सही कहा बाबा, हमने भी यहाँ आकर जबसे साधारण कपड़े पहनने शुरू किए हैं तबसे मन में भी सादगी आ गई है।
वृद्ध कल्पवासी: क्योंकि सादगी
मन को बल देती है।कल्पवास का यही उद्देश्य है मन को बाहर से हटा कर भीतर की ओर ले जाना।
गृहस्थ पुरुष : ( जिज्ञासा से पूछता है)
बाबा! क्या कपड़े बदलने से आदमी बदल जाता है?
वृद्ध कल्पवासी:(मुस्कुराकर)
नहीं बेटा, कपड़े हमें याद दिलाते हैं कि हमें अपने मन और विचारों में बदलाव करना है।
नव कल्पवासी: (भावुक होकर)
मैं समझ गया बाबा कि कल्पवास में
वस्त्र शरीर के लिए नहीं,अहंकार के त्याग के लिए होते हैं।
( गृहस्थ दंपति प्रवेश करते हैं)
गृहस्थ महिला : (संकोच से)
बाबा, मैंने सुना है कल्पवास त्याग और साधना का मार्ग है। पर इसका आरंभ कहाँ से होता है?
वृद्ध कल्पवासी: (मुस्कुराकर)
कल्पवास का आरंभ नदी तट से नहीं,
संकल्प से होता है। जब मन तय कर ले
कि कुछ समय आत्मा की शुद्धि के लिए भी निकालना हैं।
गृहस्थ पुरुष: (आश्चर्य से)
पर बाबा, अपने घर की सुख सुविधा को छोड़कर यहाँ तंबुओं में रहना , क्या यही साधना है?
वृद्ध कल्पवासी: नहीं पुत्र,
यह मात्र त्याग नहीं है। यहाँ आने का उद्वेश्य जीवन की गति को धीमा करना और उसे सरल बनाना है ताकि हमें अपने अंतर्मन की आवाज़ सुनाई दे सके।
गृहस्थ स्त्री: (नदी की ओर देखकर)
यहाँ सब कुछ इतना शांत क्यों लगता हैऔर कल्पवास के लिए यही मास क्यों चुना गया?
वृद्ध कल्पवासी: क्योंकि माघ मास में
प्रकृति स्वयं संयम में होती है। सूर्य उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश कार्य है। इस समय जल ठंडा, वायु शांत और सूर्य लगभग स्थिर अवस्था में होता है। इसीलिए यह मास आत्मशुद्धि के लिए श्रेष्ठ माना गया है। कहा जाता है कि संन्यासियों के साथ इस माह में देवताओं का भी समागम होता है।
नव कल्पवासी : तो यहाँ की दिनचर्या कैसी होती है?
वृद्ध कल्पवासी : तीन समय का स्नान, एक वक्त का सात्विक भोजन,जप,
ध्यान,सत्संग,कीर्तन, सेवा और मौन इस
दिनचर्या का पालन करते हुए कल्पवासी
केवल शरीर को नहीं बल्कि मन को भी अनुशासित करते हैं।
गृहस्थ पुरुष : (धीरे स्वर में)
मैं समझता था सुख का आधार सुविधाओं में है, पर यहाँ आकर लगता है कि सुख तो सादगी में है।
गृहस्थ स्त्री : और शायद संतोष में भी।
वृद्ध कल्पवासी: (स्नेह से)
यही तो कल्पवास का फल है कि इसमें
मन अहंकार का त्याग करके अंतर्मुखी होकर जीवन के असली रहस्य को समझने की कोशिश करता है।
नव कल्पवासी: (कृतज्ञता से)
इसका अर्थ तो यह हुआ कि कल्पवास कोई पलायन नहीं, यह अपने भीतर लौटने का साधन मात्र है।
गृहस्थ पुरुष : क्या इसका कोई प्रमाणिक शास्त्रीय आधार है ?
वृद्ध कल्पवासी: (गंभीरता से)
मत्स्य पुराण में माघ स्नान, संयम और साधना को महापुण्य कहा गया है।
पद्म पुराण बताता है कि माघ मास का एक दिन अन्य मासों के अनेक व्रतों के समान फल देता है।
स्कंद पुराण में कहा गया है कि माघ में संगम पर किया गया वास आत्मा को शुद्ध करता है।
गृहस्थ स्त्री:(जिज्ञासा से)
और वैज्ञानिक दृष्टि से भी तो इसका कोई न कोई आधार तो होगा।
वृद्ध कल्पवासी: कल्पवास केवल धार्मिक परंपरा नहीं है, इससे जुड़े ठोस वैज्ञानिक कारण हैं।
नव कल्पवासी : कृपया इसे भी विस्तार पूर्वक बताएं।
वृद्ध कल्पवासी: तो सुनो! सूर्योदय से पहले उठकर स्नान और नियमित भोजन से मानसिक स्थिरता के साथ हमारा शरीर भी ऊर्जावान बनता है।
मौन और कम बोलने से मस्तिष्क का तनाव कम होता है और विचारों की स्पष्टता बढ़ती है। आज की भाषा में तुम इसे मेंटल डिटॉक्स भी कह सकते हो।
सात्विक भोजन और उपवास से पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
गृहस्थ पुरुष: हमें प्रकृति के मध्य समय बिताने का मौका मिलता है जिससे हमें ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा मिल जाती है। मैंने सही कहा न।
वृद्ध कल्पवासी : उचित कहा, इससे मन का तनाव कम होता है। आत्म नियंत्रण की क्षमता बढ़ती है।
(नदी से स्नान कर लौटता युवा)
युवा कल्पवासी: बाबा! आज जल में उतरते ही लगा जैसे कोई बोझ उतर गया हो।
क्या यही मुक्ति है?
(संन्यासी प्रवेश करते हैं)
संन्यासी: मुक्ति कोई स्थान नहीं, वत्स।
मुक्ति वह क्षण है जब मन “चाहने” से थक जाता है और “स्वीकार” करना सीख लेता है। किसी चीज के प्रति कोई आसक्ति नहीं रह जाती।
(नाविक धीरे-धीरे नाव खेता हुआ)
धारा चलती रहती है,
किनारे बदलते रहते हैं।
अजर अमर आत्मा रहती
शरीर बदलते रहते हैं. .….
(अग्नि तेज़ होती है, सभी उसके चारों ओर बैठते हैं। कुछ क्षण का मौन और उसके बाद मंत्रोचारण की ध्वनि)
सूत्रधार : कल्पवास जीवन से भागना नहीं,जीवन को सरल बनाना है।आज का दिन इस बात को ध्यान रखने का है कि
जो मिला, उसके लिए कृतज्ञता
और जो छूट गया,उसके लिए शांति।
सामूहिक स्वर: जिसने खुद को जगाया, उसी ने ईश्वर को पाया।
(पर्दा गिरता है)
किरण बाला (चण्डीगढ़)
0 टिप्पणियाँ