साहित्य सरोज साप्ताहिक आयोजन क्रम संख्या -2 कहानी
प्रतीक आज पाँच साल बाद घर लौट रहा था। गाँव के उस सुनसान रेलवे प्लेटफार्म पर वह सुबह होने की प्रतीक्षा कर रहा था। क्योंकि यहाँ से उसे अपने गांव तक पाँच किमी की दूरी तय करनी थी, और रात को इस जगह से कहीं भी आने-जाने के लिए कोई वाहन नहीं मिलता था। इस स्टेशन तक आने वाली एकमात्र ट्रेन उसे रात दस बजे यहाँ छोड़कर 11 बजे वापस हो ली थी। लगभग रात का 2 बजे रहा था...बैंच पर बैठे प्रतीक को कुछ ठण्ड सी महसूस हुई तो उसने बैग से कंबल निकालकर ओढ़ लिया। कंबल में कुछ गर्मी मिली तो आँखें बोझिल हो गईं उसकी.. और वह नींद की आगोश में समा गया। सुबह आँख खुलते ही प्रतीक एकदम से चौंक पड़ा अरे यह क्या ? कोई और भी उसकी बगल में उसके कंबल को ओढ़कर बैठा था। नख से सिर तक कंबल से ढका हुआ...पास में ही फूलों से भरी हुईं एक डलिया पड़ी थी।
प्रतीक ने उत्सुकताबस उस अजनबी के सिर से कंबल हटाया तो उसकी नजरें अजनबी के चेहरे पर कुन्द होकर रह गयीं...घनघोर निंद्रा की आगोश में वह बेमिसाल सौंदर्य की प्रतिमूर्ति एक युवती थी...प्रतीक उस असीम सौंदर्य की मूर्ति को निहारता रह गया। प्रतीक किंकर्तव्यविमूढ़ सोचता रहा कि क्या करूँ ? उस युवती की नींद ख़राब करना भी नहीं चाहता और कंबल छोड़कर जाना भी नहीं चाहता था वह...आखिर उसने अजनबी को आवाज दे ही डाली... "अजी... सुबह हो गई है.. उठ जाइये.. कौन हैं आप?.. कहाँ जाएँगी?" कई प्रश्न एक साथ उछाल दिए थे प्रतीक ने। युवती ने आँखें खोलीं...वास्तविकता को समझकर वह झेंप उठी...."मु...झे मा.. आ..फ कर दीजिये प्लीज.... रात को बहुत ठण्ड थी तो आपका कंबल मैंने भी ओढ़ लिया.... सॉरी" डरते हुए कहा था उसने।
"आप हैं कौन और कहाँ से आयी हैं? कहाँ जाएँगी?" प्रतीक ने पूछा। "मेरा नाम मोहिनी है... यहीं स्टेशन पर फूल बेचती हूँ। कल फूल बिके नहीं... रात हो गई और मैं घर नहीं जा सकी। सुबह होने की प्रतीक्षा कर रही थी... कि ठण्ड के कारण....." "हूँ....ऊ" बीच में ही बोल उठा प्रतीक... "आपको सावधान रहना चाहिए... समय से घर निकल जाना चाहिये था..यहाँ सुनसान भी है.. आस पास हिंसक जानवर भी हो सकते हैं.... आप किसी मुसीबत में भी फँस सकतीं हैं।"... हक सा जताते हुए बोला था प्रतीक। "जी.. आप बिल्कुल सही कह रहे हैं... मैं ध्यान रखूंगी आगे से.... आपका बहुत बहुत शुक्रिया।" कहकर मोहिनी वहाँ से फूलों की डलिया उठाकर निकल पड़ी। प्रतीक भी अपने गाँव जाने के लिए स्टेशन से बाहर निकलना चाह रहा था... किन्तु उसकी नजरें बार-बार प्लेटफार्म की ओर उठ पड़ती थीं....वह प्लेटफार्म पर कुछ ढूंढ रहा था....उसको महसूस हो रहा था कि उसकी कोई प्रिय वस्तु प्लेटफार्म पर छूट गई है... वह कुछ मिस कर रहा था.. शायद मोहिनी को।
नरेश चन्द्र उनियाल,
"कमली कुंज"
देहरादून, उत्तराखण्ड।89541 40998

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