मुक्ति का तट-ओम जी मिश्रा

 साहित्य सरोज साप्ताहिक कार्यक्रम क्रमांक 01 कार्यक्रम:- तस्वीर बोली में कहानी एवं कविता

कहानी 

प्रयाग की उस धूसर सुबह में, जब सूर्य की पहली किरण ने अभी गंगा की लहरों को पूरी तरह छुआ भी न था, पंडित दीनदयाल ने अपनी फटी हुई चट्टी किनारे छोड़ी और ठंडे जल में प्रवेश किया। उनके चेहरे पर झुर्रियों का एक पूरा जाल था, जिसमें अस्सी वर्षों के अनुभव और अभावों की रेखाएँ अंकित थीं।सामने का दृश्य वैसा ही था जैसा उन्होंने बचपन में अपने पिता के कंधे पर बैठकर देखा था—त्रिवेणी के तट पर तम्बुओं का एक अनंत शहर, जिसे देख कर लगता मानो देवताओं ने स्वर्ग से उतरकर अपनी छोटी-सी बस्ती बसा ली हो। दूर ऊँचे मंदिर का शिखर कुहासे में लिपटा हुआ किसी मूक गवाह की तरह खड़ा था।

दीनदयाल ने जल की अंजलि भरी, पर उनका मन आज एकाग्र नहीं था। पास के ही एक बड़े शामियाने के नीचे, एक युवा सन्यासी प्रज्वलित अग्नि के सामने बैठा कुछ कह रहा था। लोग मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे। दीनदयाल ने पास जाकर देखा—सन्यासी के मुख पर वह तेज था जो केवल कठोर तप से आता है, पर आँखों में एक विशेष करुणा थी।सन्यासी कह रहे थे, "भय और लोभ की आहुति दिए बिना, गंगा में यह डुबकी केवल देह का स्नान है, आत्मा का नहीं।"

दीनदयाल ठिठक गए। उनके पास खोने को कुछ न था, सिवाय एक पुरानी पोटली के जिसमें उनके गांव की ज़मीन के कागज़ात और एक अंतिम इच्छा दबी थी। वह अपने पोते के लिए एक छोटा-सा घर बनाना चाहते थे, जिसे गांव के साहूकार ने हड़प लिया था। वह यहाँ 'मुक्ति' माँगने आए थे, पर क्या मुक्ति केवल मोक्ष थी? या उस अन्याय से छुटकारा भी? जैसे ही यज्ञ की अग्नि तेज हुई, भीड़ में हलचल हुई। एक अमीर सेठ, रेशमी वस्त्रों में लिपटा, स्वर्ण मुद्राएं दान करने आगे बढ़ा। सन्यासी ने हाथ रोक दिया। उन्होंने भीड़ के पीछे खड़े दीनदयाल की ओर इशारा किया और कहा, "अग्नि को स्वर्ण नहीं, वह सत्य चाहिए जो इस वृद्ध की मौन आँखों में है।"

 सेठ का अहंकार आहत हुआ, पर सन्यासी की गरिमा के आगे वह नतमस्तक हो गया। दीनदयाल आगे बढ़े। उन्होंने अपनी पोटली अग्नि के पास रखी और बोले, "महाराज, मैं यहाँ स्वर्ग माँगने आया था, पर आपकी बातों ने बताया कि स्वर्ग तो निर्भय होने में है। मुझे घर नहीं चाहिए, मुझे वह साहस चाहिए कि मैं अपने हक के लिए साहूकार की आँखों में आँखें डाल सकूं।" उस शाम जब सूरज ढल रहा था और तम्बुओं की कतारें दीपों से जगमगा उठी थीं , दीनदयाल के चेहरे पर एक नई आभा थी। उन्होंने गंगा की मिट्टी मस्तक पर लगाई और वापस अपने गांव की ओर चल दिए।तट पर सजी वे कुटियाँ और जलती हुई अग्नि अब केवल एक दृश्य नहीं थे, वे एक गवाह थे—एक ऐसे बदलाव के, जहाँ एक साधारण मनुष्य ने 'स्वर्ग' के लालच को त्याग कर 'न्याय' के संकल्प को चुना था। गंगा की लहरें अब भी वही संगीत गा रही थीं, पर दीनदयाल के लिए उनके मायने बदल चुके थे।


कविता
तट पर सजीं पावन कुटी, जन-मन उमड़ता आ रहा,

सुर-सरि विमल की धार में, हर भक्त गोते पा रहा।

यज्ञीय पावक उठ रही, नभ में महकती शांति है,

सद्ज्ञान का आलोक ही, मन अन्धकार मिटा रहा॥

​चोले बसन्ती सन्त के, सुरभित यहाँ परिवेश है,

तप-त्याग की इस भूमि पर, मिलता प्रभू-आदेश है।

श्रद्धा समर्पण के दिए, जल पर लहरते दीखते,

मिटता हृदय का द्वेष है, रहता न कोई क्लेश है॥

​कल-कल प्रवाहित धार में, प्रभु का झलकता रूप है,

छाया कहीं शीतल घनी, तो कहीं तीखी धूप है।

साधक लगाये ध्यान हैं, निज आत्म-तत्व निहारते,

गूँजे यहाँ ओंकार ध्वनि, जो दिव्य और अनूप है॥

​मंदिर शिखर ऊँचे खड़े, गाथा सुनाते धर्म की,

है प्रेरणा मिलती यहाँ, बस शुद्ध पावन कर्म की।

उठती चतुर्दिक धुंध पावन, है हवन की अग्नि से,

मिटती सभी बाधा यहाँ, अरु गाँठ खुलती मर्म की॥

ओम जी मिश्र 'अभिनव' लखनऊ 94500 82362



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