साहित्य सरोज साप्ताहिक कार्यक्रम क्रमांक 01 कार्यक्रम:- तस्वीर बोली में कहानी एवं कविता
कहानी
यह कहानी एक ऐसी नदी की है जो अनेक रहस्यों को लेकर उत्पन्न हुई थी। आज ऐसी ही कहानी मैं आप लोगों के बीच लेकर आई हूँ। इस कहानी में हम जानेंगे कि इस नदी का नाम ब्यूटीफुल रहस्यमयी नदी क्यों रखा गया।एक छोटा-सा गाँव था, उस गाँव का नाम काशी-पुरम था और इस गाँव में एक ऐसी नदी थी जो रहस्य से भरी हुई थी। देखने में यह नदी किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं थी, किंतु इस नदी की मान्यता थी कि जो भी इस नदी में जाता है, उसके शरीर का रूप निखर जाता है। यह नदी विचित्र रूप से अपने आप को सजा के रखती थी, जैसे मानो यह नदी सामने वाले को बुला रही हो, अपनी ओर खींच रही हो।
प्रातःकाल जो भी इस नदी के किनारे से गुजरता था, उसे यह नदी आकर्षित कर ही लेती थी। ऐसा कोई भी इंसान नहीं था जो यहाँ एक डुबकी लगाकर न जाए। आश्चर्य की बात यह थी कि लोग काम करने निकलते समय एक वस्त्र अपने साथ लेकर चलते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि यह नदी अद्भुत कार्य को अंजाम देती है। न चाहते हुए भी इस नदी में जाना पड़ता था, यह नदी अपनी ओर आकर्षित करती थी।एक दिन की बात है, काशी-पुरम गाँव में एक किसान अपने हलों को लेकर जा रहा था और जाते-जाते उसके खेत के पास यह नदी पड़ती थी। वह जितनी बार हल चलाता, उतनी बार ही उस नदी में डुबकी लगाकर आता, मानो उसकी थकान नदी ने हर ली हो और उसे एक नई ऊर्जा के साथ तैयार कर दिया हो।इसके साथ ही जैसे ही वह किसान अपने घर गया, उसकी बीवी पारो उसे देखते ही रह गई, मानो विवाह के पहले का दृश्य देख रही हो। उसका यौवन ऐसा खिल रहा था जैसे रोमांच से भर उठा हो।पारो ने कहा—“ऐ जी, सुनते हो! आज आप इतने खूबसूरत क्यों लग रहे हो?” किसान, जिसका नाम शंकर था, वह बोल उठा—“यह सब करिश्मा उस रहस्यमयी नदी का है। आप मेरी बात मानो, एक बार तुम भी नहा लो। रोज मेरी बात टालती रहती हो। चलो… मेरे साथ खेत, तुम्हारे में भी कुछ बदलाव ज़रूर आएगा।” पारो बोली—“सही कहते हो। आप चलो, कल मैं भी चलती हूँ।”
जैसे ही सुबह हुई, किसान और किसान की पत्नी दोनों नदी की तरफ निकल पड़े और अपने वस्त्र रखकर नदी में नहाने लगे। नहाते हुए उन्हें कई लोगों ने आते-जाते देख लिया और सभी को इस रहस्यमयी नदी के बारे में पता था। सभी लोग अपनी-अपनी पत्नी को लेकर नदी में नहाने लगे और एक-दूसरे को प्यार भरी नज़रों से देखने लगे।किंतु उसी रास्ते से एक विदेशी महिला और पुरुष आ रहे थे। उन्होंने जब यह देखा तो वहाँ रुककर बैठ गए और जैसे ही लोग नदी से बाहर निकलकर आए, वैसे ही वे किसान की पत्नी से बोले—“क्या हम लोग भी इस नदी में नहा सकते हैं? इतनी भीड़ है इस नदी में, कुछ तो बात है। क्या इस रहस्य को हम जान सकते हैं?” किसान की पत्नी ने जवाब दिया—“इस रहस्य को आज तक किसी ने नहीं जाना है। रहस्य को बताने वाली दादी, जो ठीक इसी कुटिया में रहती हैं, जो नदी के पास है, वहीं बैठी हैं। वही बताएँगी।” विदेशी महिला और पुरुष की उत्सुकता बढ़ी और नहाने से पहले उन्होंने सोचा कि क्यों न उस दादी से मिल लिया जाए। कुटिया के अंदर जैसे ही गए, दादी भगवान भोलेनाथ के ध्यान में मग्न थीं।
विदेशियों ने दादी को आवाज़ लगाते हुए कहा—“दादी जी… आपको सादर प्रणाम। कृपया आप आँखें खोलें और रहस्यमयी नदी का पर्दा उठाएँ। आखिर इसका राज़ क्या है? हम जानना चाहते हैं, प्लीज़ हमें बताइए।”दादी मंद-मंद मुस्कान से मुस्कराने लगीं और बोलीं—“इस रहस्य को बताने का एक खास दिन होता है।”विदेशी थोड़ी देर के लिए उदास हो गए। आज वे रहस्य से पर्दा नहीं उठा पाएँगे। किंतु कुटिया के बाहर से सुन रहे किसान और उसकी पत्नी ने कहा—“बूढ़ी दादी, पूर्णिमा तो कल ही है। हम कल आपके पास फिर आएँगे। इस रहस्य से पर्दा हटाने हम सभी गाँव वालों को भी जानना है।”दादी ने कहा—“यह रहस्य अगर आप गाँव वाले सुन लेंगे, तो इसकी शक्ति और यह नदी जो अद्भुत संगम को बटोरे हुए है, सब समाप्त हो जाएगा। इस रहस्य का पर्दा केवल ये दोनों विदेशी ही सुन सकते हैं। गाँव का अगर कोई भी व्यक्ति सुनेगा, तो उसकी मृत्यु वहीं तुरंत हो जाएगी। इसलिए मैं आप लोगों को सचेत करती हूँ कि कल के यज्ञ में, जैसे हर साल कोई नहीं आता है, वैसे ही आप लोग भी नहीं आएँगे। यह आप सबकी भलाई के लिए मिला वरदान है, इसे अभिशाप में मत बदलो। यह मेरी सलाह है।”किसान की पत्नी बोली—
“यह कैसा रहस्य है जो हम गाँव वाले नहीं जान सकते?” किंतु किसान ने अपनी पत्नी को डाँटते हुए कहा—“जब दादी मना कर रही हैं तो तुम्हें उनकी बात माननी चाहिए। कुछ भी हो, हमारी भलाई के लिए ही तो यह सब रहस्य रचा गया है। फिर क्यों तुम्हारी उत्सुकता बढ़ रही है?”यह कहकर किसान और उसकी पत्नी घर चले गए। किंतु जो दोनों विदेशी उस तट पर बैठे हुए थे, वे सोचने लगे— रहस्य तो कल पता चलेगा, क्यों न आज इस नदी में नहा कर हम भी सौंदर्य को प्राप्त कर लें। दोनों नदी में एक साथ उतरे और एक-दूसरे को निहारते हुए प्रेम भरी निगाहों से देखने लगे। और साथ ही पूर्णिमा की रात का इंतज़ार करने लगे। जैसे ही सुबह हुई, दोनों ने स्वयं को जब आईने में देखा, तो हर रोज़ से उनका निखार कई गुना अधिक था। विदेशी लड़की रोज़ी ने कहा—“जॉन्स, तुम बहुत हैंडसम लग रहे हो।” जॉन्स ने प्रत्युत्तर में कहा—“रोज़ी, तुम तो पूरी रोज़-फ्लावर जैसी दिख रही हो। सच में यह नदी बहुत ही खूबसूरत है। लगता है इस नदी का नाम हम रहस्यमयी नदी के साथ खूबसूरत सरोवर रख दें।”
दोनों ठहाके लगाकर हँसने लगे।फिर क्या था— धीरे-धीरे शाम हुई और फिर रात हो गई। पूर्णिमा की रात जैसे ही आई, गाँव में सन्नाटा छा गया और जो साधु-संत आकर यज्ञ करते थे, वे अपनी तैयारी में लग गए। बूढ़ी दादी कुटिया से बाहर आकर पहरा देने लगीं कि गाँव का कोई भी व्यक्ति इस रहस्य की कथा और यज्ञ को न देख पाए।जैसे ही यज्ञ शुरू हुआ, कथा होने लगी। किसान की पत्नी किसान को लेकर नदी के तट पर पहुँची और यज्ञ को देखते हुए मुरझाकर गिर गई। वहीं उसकी मृत्यु हो गई।विदेशी महिला और पुरुष, जो यज्ञ के ठीक सामने बैठे थे, यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित रह गए और कथा सुनते हुए वे उस रहस्य के बारे में जान चुके थे।
कविता
मनमोहक प्यारी- सी नदी है तू
ममता से सदैव भरी पड़ी है तू
गहराई में तेरे समा जाऊं मैं
प्रेम की डुबकी लगा जाऊं मैं ।
कितनी सुंदर, मनोहर प्यारी सी तू लगती है
प्रेम- समर्पण सा तू हरदम छलकती है
दृश्य तेरा मन में भाव जगाता है
मन मेरा तेरे दृश्य को देख प्रफुल्लित हो जाता है।
तेरी लहरें जब उठ- उठ कर गिरती है
हारे हृदय में हिम्मत सदैव यह भरती है
सुख-दुख दोनों तेरे अंदर समा जाते हैं
तेरी अविरल "धारा" कुछ सीख नया सीखा जाते हैं।
प्रणाम सदैव मैं तुझको करती हूं
तेरे आंचल में शीश मैं धरती हूं
धैर्यता तुझसे मैं सीख रही हूं
हर- हर गंगे कहकर चीख रही हूं।
सौंदर्य की प्रकाष्ठा को पार कर
धरा वासियों पर एक उपकार कर
एक सच्चाई को सदा स्वीकार कर
प्रकृति को नष्ट करने वालों पर सदा प्रहार कर।।
ज्योति सिंह वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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