आखिरी शाम-अनुज पाल

 *साहित्‍य सरोज साप्‍ताहिक आयोजन क्रम संख्‍या-2* कहानी

रेलवे प्लेटफॉर्म पर उस शाम धुँध कुछ ज्यादा ही गाढ़ी थी। जैसे आसमान ने अपने भीतर का सारा बोझ उतारकर जमीन पर बिखेर दिया हो। पीली रोशनी वाला एक अकेला लैम्प पोस्ट काँपती लौ के साथ खड़ा था। मानो समय का कोई थका हुआ प्रहरी। उसी प्लेटफॉर्म के एक पुराने लकड़ी के बेंच पर सिद्धार्थ और नंदनी बैठी थी, पीठ से पीठ लगाए। लेकिन मन से मीलों दूर।सिद्धार्थ सिर झुकाए बैठा था। दोनों कोहनी घुटनों पर टिकी हुई, उँगलियाँ आपस में उलझी हुई। उसकी आँखें जमीन पर जमी थीं, जैसे वहीं कोई प्रश्न दबा पड़ा हो। वह बार-बार साँस खींचता, फिर छोड़ देता। पर हर साँस के साथ भीतर का बोझ हल्का नहीं होता और भारी हो जाता।

नंदनी उसके ठीक पीछे बैठी थी। उसने अपने बैग को कसकर पकड़ रखा था। जैसे उसमें केवल कपड़े नहीं, बीते हुए दिन, अधूरी बातें और अनकहे सवाल भरे हों। उसकी आँखें दूर पटरियों पर टिकी थीं, जहाँ से एक ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रही थी। ट्रेन की आवाज उसके भीतर की खामोशी से टकरा रही थी।वे दोनों एक-दूसरे को देख नहीं रहे थे, लेकिन एक-दूसरे की मौजूदगी को पूरी तीव्रता से महसूस कर रहे थे। उनकी कहानी कोई आज की नहीं थी।

तीन साल पहले, इसी शहर में, इसी स्टेशन से कुछ दूर, एक कॉलेज की लाइब्रेरी में उनकी पहली मुलाकात हुई थी। सिद्धार्थ किताबों की अलमारी के सामने खड़ा था, “अज्ञेय” की कविताएँ खोजता हुआ। नंदनी पीछे से आई थी और बिना देखे बोल पड़ी थी-“अगर कविता समझनी हो, तो सिर्फ पढ़नी नहीं चाहिए… जीनी भी चाहिए।” वह पलटकर देख बैठा था और उसी पल, जैसे उसके भीतर कुछ स्थिर हो गया हो। इसके बाद मुलाकातें बढ़ीं। कभी चाय की दुकानों पर, कभी बरसात में भीगते हुए, कभी बिना वजह हँसते हुए। वे दोनों जानते थे कि जीवन इतना सरल नहीं होता, लेकिन उस समय यह भ्रम मीठा था। फिर समय बदला।

नौकरी, परिवार, जिम्मेदारियाँ सब कुछ एक-एक कर सामने आने लगा। वह किसी और शहर में नौकरी करने लगा। वह यहीं रह गई। अपने बीमार पिता और छोटे भाई के साथ। फोन कॉल्स कम होती गईं, मैसेज छोटे होते गए। “मैं व्यस्त हूँ” और “तुम समझती क्यों नहीं?” जैसे वाक्य रिश्तों की दीवारों में दरार डालने लगे।और फिर वह दिन आया। आज।आज नंदनी को यह शहर छोड़ना था। शायद हमेशा के लिए।नंदनी जानती थी कि अगर वह पीछे मुड़कर देखेगी, तो आँसू बह पड़ेंगे और अगर आँसू बह गए, तो वह रुक जाएगी और वह रुक नहीं सकती थी। कुछ रिश्ते इसलिए नहीं टूटते कि प्रेम कम हो जाता है, इसलिए कि परिस्थितियाँ ज्यादा भारी हो जाती हैं।

सिद्धार्थ ने धीमे स्वर में कहा,

“तुम्हें जाना ही है… है न?”

नंदनी ने उत्तर नहीं दिया। सिर्फ अपनी उँगलियों को बैग की जिप पर कस लिया।

“अगर मैं कहूँ कि मत जाओ?”

उसके स्वर में उम्मीद नहीं थी, सिर्फ थकान थी।

नंदनी ने सिर झुका लिया।

“अगर तुम कहते… पहले कहते… तो शायद”

वाक्य अधूरा रह गया। जैसे उनकी कहानी।

ट्रेन अब प्लेटफार्म के पर आ चुकी थी। उसकी हेडलाइट धुँध को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी। सीटी की ध्वनि ने प्लेटफार्म की खामोशी को तोड़ दिया।नंदनी उठी। उसने पलटकर नहीं देखा। शायद उसे डर था। कि अगर उसने देख लिया, तो वह अपने आप को संभाल नहीं पाएगी।सिद्धार्थ वहीं बैठा रहा। उसने भी नहीं देखा। शायद उसे भी डर था, कि अगर उसने देख लिया, तो वह टूट जाएगा।कुछ पल बाद, ट्रेन चल पड़ी।पटरियों पर आवाज गूँजती रही, फिर धीरे-धीरे धुँध में खो गई।बेंच पर अब सिर्फ सिद्धार्थ बैठा था और दूसरी तरफ, एक खाली जगह। लेकिन उस खाली जगह में एक पूरी जिंदगी की यादें बैठी थीं।सिद्धार्थ ने जेब से एक पुरानी पर्ची निकाली। वही, जिस पर नंदिनी ने कभी लिखा था- “अगर कभी हम बिछड़ जाएँ, तो याद रखना कुछ मुलाकातें पूरी नहीं होतीं, फिर भी अधूरी नहीं कहलातीं।” उसकी आँखों से एक आँसू गिरा। वह आँसू प्लेटफार्म की धूल में समा गया। जैसे प्रेम अक्सर समय में समा जाता है। लैम्प पोस्ट अब भी जल रहा था। धुँध अब भी थी। ट्रेन जा चुकी थी।लेकिन उस प्लेटफार्म पर, उस बेंच पर, उस शाम दो लोगों की एक पूरी कहानी हमेशा के लिए ठहर गई थी।


अनुज पाल ‘सार्थक’

संपर्क- केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा

मो. 8755123629



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