जादुई शंख-लीला दीवान

 भीड़ का रेला मंदिर की तरफ जा रहा था। तिल रखने की जगह नहींथी। सब एक साथ धक्का-मुक्की करके मंदिर में सबसे पहले जाना चाहते थे।कोरोना के बाद आज पहली बार मंदिर खुला था।सब लोग अपने प्रभु से मिलना चाहते थे। वह सब जादुई  शंख के दर्शन करना चाहते थे।यह वह जादुई  शंख हैं। जिसके दर्शन  भाग्यशाली लोगों को ही होते हैं।जो एक बार इसके दर्शन कर ले उसके सारे रोग कट जाते हैं ।इसीलिए सब जल्दी-जल्दी मंदिर पहुंचना चाहते थे।मैं भीअपनी सहेली रानी का हाथ पकड़े मंदिर की तरफ बढ़ रही थी। हम दोनों बहुत थक चुके थे। सो एक चबूतरे पर बैठ गए। हमारे पास एक पेड़ था पेड़ छोटा सा था दस पंद्रह फुट का होगा । उसकी खुशबू आ रही थी ।इतनी खुशबू हमने आज तक नहीं महसूस की हमारी समझ में नहीं आ रहा है यह खुशबू किसकी आ रही है उस पेड़ के अंदर से दूधिया चांदनी जैसी रोशनी निकल रही थी ।मैंने जैसे ही देखा बड़ा अजीब लगा ।उस पेड़ के पत्ते नहीं थे ।बस छोटे-छोटे फूल जैसे थे सब सफेद थे उन्हीं से रोशनी निकल रही थी मेरे पास जो टहनी थी उस पर एक बड़ा सा शंख लगा हुआ था मैंने रानी से कहा रानी देख शंख का पेड़ रानी बोली तोड़ ले मैंने टहनी को नीचे किया। रानी के हाथ में टहनी पकड़ाई और मैं शंख तोड़ने लगी शंख बड़ा था। लेकिन मैंने तोड़ लिया।


  अब शंख मेरे हाथ में था ।मैं उसे देख रही थी। जहां से थोड़ा वहां पर हरे हरे छोटे रेशै जैसे दिखाई दे रहे थे। उससे पानी निकल रहा था। जैसे अपनों से दूर होने का दुख होता है ।शंख को भी पेड़ से अलग होने का दुख था।शंख मेरे हाथ में था। मैं रानी से कह रही थी रानी मुझे तो शंख बजाना आता नहीं तू रख ले इसे तुझे बजाना आता है।इतने में एक सफेद पोशाक पहने देवदूत जैसा दिखने वाला व्यक्ति हमारे पास आया और बोला बहन जी आप तो बहुत किस्मत वाले हो इसी शंख के लिए दर्शन के लिए तो इतनी भीड़ आई हुई है।मैंने कहा देखो इस पर तो कितने शंख लगे हुए हैं। वह व्यक्ति बोला यह तो आपको दिखाई दे रहे हैं सबको नहीं दिखते।मैं हंस रही थी क्या मुझे दिव्य दृष्टि मिल गई ।वह व्यक्ति बोला शायद।मैंने रानी को कहा देख रानी कितने शंख लगे हुए हैं। हां पर छोटे छोटे हैं कोई चने जितने कोई कोड़ी जितने कोई मोगरे के फूल जितने पूरा पेड़ भरा हुआ है ।पत्ते तो है ही नहीं।रानी ने कहा मुझे तो नहीं दिखाई दे रहे है।वह व्यक्ति मुस्कुरा रहा था मैं बड़े प्यार से पेड़ को देख रही थी।कभी उस शंख को देख रही थी जो अभी-अभी मैंने तोड़ा था ।मैं उस व्यक्ति से बोली यह सब शंख  के दर्शन करने आए हैं। तो लो आप इसे ले जाओ। सबको  दर्शन कराओ।उसने धन्यवाद कहा और दोनों हाथ जोड़कर पहले प्रणाम किया और शंख को बड़े आदर्श के साथ अपने हाथों में ले लिया।


मैंने रानी का हाथ पकड़ा और आगे बढ़ने लगी ।पर बार-बार विचार आ रहा था पेड़ पर शंख लगते हैं। शंख तो समुद्र में होते हैं। इतना विचार आते ही मैंने  पीछे मुड़कर देखा वहां पर पेड़ नहीं था।रानी ने कहा प्यास लग रही है पानी पीते हैं मुझे भी लगा मुझे प्यास लगी है इतना सोचते ही आकाश में एक बड़ा मटका लटक रहा था। और पानी की धारा उससे निकल रही थी हमने बोक से पानी पिया। पानी शीतल था। मीठा था आज तक ऐसा पानी का स्वाद नहीं चखा पानी क्या अमृता था। हमारे पानी पीते ही वह मटका वापस ऊपर की तरफ खिंच गया। हम भी आगे बढ़ गए भूख भी लगी थी। कचोरियां पूरी बन रही थी ।लेकिन इतनी बड़ी कढ़ाई हमने आज तक नहीं देखी इतनी बड़ी कढ़ाई जिससे दस बारह आदमी पूरी निकाल रहे थे कचोरीओं का ढेर था। आलू की सब्जियां बन रही थी कहीं भाटिया सीख रही थी कहीं चोखा बन रहे थे ।हमें ये  देखकर भूख लग गई। इतना सोचते ही सोने की प्लेट में हलवा पूरी लेकर वह देवदूत हमारे पास आया और हमारे हाथों में पकड़ा दी।


वह चला गया कोई किसी से बात नहीं कर रहा था चारों तरफ शांति थी सब अपना अपना काम कर रहे थे यह कैसी दुनिया है आवाज से परे सब तरफ से खुशबू आ रही थी खाने की।सब मंदिर की तरफ चले जा रहे थे ‌मैंने भी रानी का हाथ पकड़ा और मैं भी मंदिर की तरफ चल दी। मेरी आंख खुल गई अरे यह तो सपना था कितना सुंदर सपना था ।और सुबह से लेकर अभी शाम तक मैं सपने में खोई हुई हूं सोचा क्यों नहीं ऐसे कलम बध किया जाए।


स्वरचित
डॉक्टर लीला दीवान जोधपुर राजस्थान
अँखिल भारतीय अग्निशिखा मंच - सदस्य 


 


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