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सजी संवरी बन बैठी तू
हरी चुनरिया लहराये जब
प्रकृति हरियाली बन जाये तब
केसरिया चोली पहन कर तू
सिन्दूरी हो जाये जब
अरुणोदय की लाली लिये तू
लाज से सिमट जाये तब
सफेद वस्त्र का घाघरा पहने
तू तापसी बाला बन जाये जब
सहज ह्दय प्रेम का बन तू
परिवार बन जाये तब
अशोक चक्र का मांग टीका पहने
तू अपने यौवन पर इतराने जब
भारत के नदियाँ भी भर - भर
जवाँ जवाँ भरी भरी हो जाये जब
भारत माता बनकर तू तब जग
की रानी बन जाती है
बस क्षितिज की सिन्दूरी आभा
पाने तू दिन भर धूप बनकर
सूरज के साथ चलती है
कितना सुन्दर मिलन होता है
लाज की अरुणोदयभारत बाला
का
सूर्यास्त संग शक्ति सहचरी बन
मिलन होता है
गोधुली बेला मे ही इसलिए
भारत माता तेरी धरा पर लगन
होता है
रेखा तिवारी, बिलासपुर
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