मॉं का आंँगन-रेखा

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सर्वश्रेष्‍ठ रचना


भूल गई माँ आँगन में तेरे 
मन एक छोटा सा छौना।
जब से आई ढूंढ़ रही हूँ
तेरे हाथ का किया बिछौना।।


चमचम करती बिंदिया तेरी
दमक रही है मेरे मन में ।
घूम रही है आकर तू 
मेरी यादों के आँगन में।।


 वो लहराता आँचल तेरा
 पकड़ जिसे मैं चलती थी ।
 चँदा को दिखला कर तू
मुझ से ढेरों बातें करती थी।।


ढूंढ रही बचपन वो अपना
जब निर्मल था मन कोना।
लौटा दो ना मेरा वो बचपन
कर दो ना माँ कोई टोना ।।


फिर मैं बच्ची बन जाऊं
औऱ तुम डाँट लगा जाओ ।
मैं फिर रो कर दर्द सुनाऊं
तुम मुझको समझा जाओ।।


अम्मा फिर आ जाओ ना
लिपट प्यार जता जाओ।
जिद्द मेरी पूरी कर जाओ
गुड़िया मेरी ढूढ़वा जाओ


टूटे हैं जो माला के मोती 
आज उन्हें पिरोने बैठी हूँ।
दिल सा टूटा ले कर बैठी
उखड़ी-उखड़ी रहती हूँ।।


माँ तुम धागा लेकर आना
मेरा टूटा दिल जुड़वा जाना।
हार गई मैं जोड़-जोड़ कर
तू अपना प्यार लुटा जाना।।


मैं जब भी मायके आती हूँ
तब भीगे मेरे मन का कौना।
फिर मिल जाये बचपन छौना
माँ तेरे हाथ का किया बिछौना।।


 


रेखा दुबे तिरूपति पैलसे विदिशा


 



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