मधुर मिलन-अनुभा




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ऐ मेघअब तुम आओ ना,
शीतलता फिर दे जाओ ना,
महीनों से प्यासी धरती पर
नेह जरा बरसाओ ना।


सूरज की तपती किरणों ने
मुझको यूं झुलसाया है
मेरी इन दरखो को भरने
नेह जरा बरसाओ ना।


शक्ति मेरी क्षीण हुई है, 
नवजीवन देना मुश्किल है 
फिर से हरियाली लाने को
नेह जरा बरसाओ ना।


सृष्टि का यौवन फिर लौटे,
मन मयूरा नाच उठे
थमती धड़कन में सांसे भरने
को नेह जरा बरसाओ ना। 


उस मधुर मिलन की आशा ने
सहना सब कुछ सिखलाया है
अंतर तम मेरा भीगे ऐसे
नेह जरा बरसाओ न।


खिल जाऊं फिर मैं भी जैसे
सजना के आगे सजनी
रूप निखर जाए मेरा भी।
नेह जरा बरसाओ ना।


ऐ मेघ अब तुम आओ ना
शीतलता फिर दे जाओ ना
महीनों से प्यासी धरती पर
नेह जरा बरसाओ ना।


अनुभा जैन, विदिशा मध्‍यप्रदेश।



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