कजरी-डां अंजुल

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ऐ सखि सावन में कजरी गाएँ
एक बरस बाद सावन आया
साथ में हरियाली लाया जी भर कर।


ऐ सखि सावन में कजरी गाएं
ऋतुराज ने मांग सजाई
रति के कर्णफूल मुस्कुराए
गुलाब इठलाया गालों पर


ऐ सखि सावन में कजरी गाएं
अवनी अम्बर पर छाई बहार
फैली बेल गुलमोहर की जी भर कर।


ऐ सखि सावन में कजरी गाएँ
रति का मनोरम स्पर्श
कामदेव कर रहे मनुहार
प्यार भरी अठखेलियां जी भर कर।


ऐ सखि सावन में कजरी गाएं
सावनिया नार लजाने लगी
साजन मुस्कुराये जी भर कर।


ऐ सखि सावन में कजरी गाएँ
जूडे में सजाया फूल
हरसिंगार झरता जाए,
हाथ कंगन आरसी सकुचाए
दर्पण में देख मुस्कराए जी भर कर।


एक बरस बाद सावन आया
साथ में हरियाली लाया जी भर कर।


ऐ सखि सावन में कजरी गाएँ
हरी चुनरिया उड़ती जाए
आओ सखियां झूला झूलें
कजरी गाएं जी भर कर
ऊंची नीची पेंग बढाते जाएं


एक बरस -- - -


डां अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
इंदौर मध्यप्रदेश स्वरचित
28-6-20



 


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