झील की वफा-अशोक

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नीली नीली ये झील की वफा भरी आँखें
ये नीम सिज्द कनारों की शर्म सार पलक
ये तैरती हुई ख्वाबों की चमकती कश्ती
आओ, सफ़र की शाम में जरा यहाँ ठहरें। 


महकते गेसुओं की तरह हवा छू जाए
धड़कती जमीं के सीने से एक ग़ज़ल उभरे
तेरी बेदाग़ बेगुनाह मुहब्बत की तरह
हिलोर लेती हों बिलौरी झील की लहरें। 


निगाहों सी मैनुमा शफ़क़ की ठंडी धूप
तुम्हारी खिली हँसी जैसी खिलखिलां ये फ़ज़ां
तुम्हारी करीबी से उमडते हुए ज़ज्बात
के जिंदगी के ये अहसास और भी गहरें । 



व रोशनी करे सलाम थके मुज़रों सी
हिरन सा कुलांचें भरता सूरज भी छुप जाए
के तन्हाई का खामोशी से बजे धीमा सितार
उतार रोशनी दिशाएँ अंधियारा पहरें l


हो चाँदनी खिली, इन लबों की जैसे हँसी
नरम अंगुलियों सी हवा तन को सहलाये
उमंगति जागती हो रात की हर अंगड़ाई
निसार इसपे करें आओ करोड़ों सहरें। 
आओ, सफर की शाम में जरा यहाँ ठहरें! 
               
- डा. अशोक मेहता, कोटा।


 



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