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उड़ने दो
अब परिंदों को
फैलाने दो
उसके पंख
दे दो उसके
हिस्से का आसमाँ
और मिटा दो
अपने माथे का कलंक ।
खोल दो
दरवाज़े पिंजड़ों के
लगने दो जंग
उनकी सलाखों में
बतिया लो
बेजुबाँ परिंदों से
खत्म करो जंग
उनकी लाचारी और
अपने दंभ के बीच की ।
रोक लो
इस अंतहीन विनाश को
दो बोल मिसरी के
दो दाने सम्मान के
एक बार देकर देखो
समझ उसके स्वाभिमान को
अरे ! वे तो परिंदे हैं
नियति है उड़ने की
कहाँ ख्वाहिश उनकी
कि बस जाएं महलों में ।
समझ लो
उनके छोटे- छोटे सपनों को
छोटा ही है पेट उनका
उद्यम बस क्षुधा पूर्ति की
नहीं चाहत गोदाम की
दो दाने चुग बस उड़ने की
न कुचलों उनकी हिम्मत
कि आ जाए सैलाब उनके आहों की
अब थम जाओ और थाम लो
रेंगने न दो उन परिंदों को
क्योंकि फितरत है उनकी बस उड़ने की ।
सारिका भूषण
राँची , झारखंड
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