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अरे सुनो , आरती ने प्रकाश को आवाज लगाई , आज ऑफिस से जल्दी आ सको तो हमें सिविल हॉस्पिटल जाना हे जरुरी में |क्यों ? कौन भर्ती हे वहां ? प्रकाश ने ऑफिस के लिए तेयार होते हुए पूछा | मेरी सहेली रीमा | आरती ने बताया अच्छा वही तुम्हारी माडर्न सहेली |हां हां वही बेचारी बहुत बीमार हे |ठीक हे में चार बजे तुम्हारे ऑफिस आ जाऊंगा | तुम भी बास से जल्दी छुट्टी का बोल देना | लेकिन पप्पू का क्या होगा ? उसका स्कूल तो साढे चार बजे छूटता हे |उसे लेकर ही चलेंगे ,तुम उसे लेते हुए मेरे ऑफिस आ जाना |ठीक हे डार्लिंग जैसा आपका हुक्म | कहते हुए प्रकाश ने आरती पर एक प्यार भरी द्रष्टी डाली अरे हटो भी ऑफिस जाते वक्त ये प्यार मोहब्बत कहाँ से ले आये ?
डार्लिंग तुम्हे जब भी गोर से देखता हु तो अपने आप दिल में प्यार की हिलोरेँ उठने लगती हे | अच्छा चलो नो मस्का में जा रही हु ठीक साढे चार पर आ जाना | आरती ने अपनी मोपेड निकाली और ऑफिस के लिए चल दी | रीमा की याद आते ही कुछ देर पहले का प्रफुल्लित मन फिर उदास हो गया | आज सुबह ही रीमा के फ्लेट के पडोसी का फोन आया था कि रीमा दो दिन से बीमार हे और कल ही उसे हॉस्पिटल में एडमिट करवाया हे | कौन होगा उसके पास ? इसी चिंता में डुबी आरती ऑफिस पहुंची ,लेकिन काम में जरा भी मन नहीं लगा | ऐसे अकेले भी कोई जीवन काट सकता हे भला ? लेकिन रीमा आज अकेली हे , पहले कहां थी अकेली रीमा पहले तो खूब व्यस्त थी रोजाना नये नये दोस्तों के साथ हमेशा हंसती मुस्कराती ,जिंदादिल और दिलफेंक |
आरती को छ वर्ष पहले की होस्टल लाइफ याद आ गई | रीमा और वो दोनों वर्किंग वुमेन हॉस्टल में रूम मेट बनी थी वहीँ दोस्ती हुई थी दोनों में | घर परिवार दिल्ली से बाहर था ,दोनों पढाई के बाद नोकरी की खोज में दिल्ली आई थी | प्राइवेट कंपनियों में नोकरी तो अच्छी मिली ,लेकिन रहने को हॉस्टल के सिवा कोई चारा नहीं था |
शुरू दिन से ही आरती रीमा से बहुत प्रभावित थी | हंसमुख मिलनसार जिंदादिल रीमा बहुत स्मार्ट और खुबसूरत थी बड़े ऊँचे सपने पाल रखे थे उसने | और आरती ? बस एक अच्छी सी नोकरी ,एक अदद पति और परिवार ,यही उसकी महत्वाकांछा थी | होस्टल में एक वर्ष बितते ना बितते दोनों काफी घनिष्ठ हो गई थी आरती को अपने ऑफिस में कार्यरत एक सीधा सादा सादगीपूर्ण किन्तु आकर्षक पिघलती 2 युवक प्रकाश के रूप में एक दोस्त मिला था जबकि रीमा के दोस्तों की कमी नहीं थी | चार छह दोस्त तो उसके हमेशा बने रहते थे ,और उनमे से ही कोई एक खास भी हुआ करता था लेकिन ये खास भी दो चार महीने में बदलता रहता था |
आये दिन डिस्को जाना क्लब जाना और पार्टिया करना यही दिनचर्या थी रीमा की | कभी कभी आरती भी उनके साथ शरीक होती ,लेकिन उसे ये पार्टी लाइफ ज्यादा पसंद नहीं थी |उसका प्रकाश के प्रति प्यार धीरे धीरे परवान चढ़ रहा था |देख रीमा अब तू भी ये मोज मस्ती छोड़ और कोई अच्छा सा एक दोस्त खोज कर उसे परमानेंट जीवनसाथी बना ले |
ओह नो आरती , मुझसे ये नहीं होगा | किसी एक के साथ फुल टाइम ? यार में तो बोर हो जाउंगी | आरती चोंकी ,तो क्या जिन्दगी भर ऐसे ही दोस्त बदलती रहेगी ? अरे यार जब कोई सुपर स्मार्ट ,एवरग्रीन हीरो मिला तो उसे पति भी बना लुंगी बशर्ते वो मेरी जिन्दगी में रोज नए नए रंग भरे | रीमा ने बड़ी अदा के साथ अपनी इच्छा जताई |
अच्छा तो तू शर्तो के साथ शादी करेगी ? अच्छा आरती तू एक बात बता क्या तू फुल लाइफ एक ही फ्लेवर की आइस्क्रीम खाते खाते उब नहीं जाएगी ? आरती ने चोंक कर रीमा की मदमाती आँखों में देखा `रीमा ये लाइफ केवल स्वाद या फ्लेवर से जी सकने वाली आइस्क्रीम नहीं हे और ना ही पति या जीवनसाथी कोई आइस्क्रीम का डब्बा | अरे यार मेरा मतलब में समझ रही हु तेरा मतलब ,ये जो अलग अलग तरह की आइस्क्रीम का शौक रखती हे न तु ,कितनी देर लगती हे इस आइस्क्रीम को पिघलने में ?
आरती प्लीज नो फिलासफी रीमा का स्पष्ट उत्तर था | में फिलासोफी नहीं बता रही रीमा अभी वक्त हे कोई अच्छा सा साथी देख और गृहस्थी बसा लू ,बच्चे पैदा करू और किचन सम्हालू | में नहीं करने वाली ये सब ,तू ही बन जा आदर्श गृहणी |और आरती सचमुच में आदर्श गृहणी बन गई | प्रकाश का स्वभाव , विचारधारा और जीवनशैली उसे भा गई थी | दोनों के घरवालो ने भी कोई विरोध नहीं किया और दोनों विवाह बंधन में बंध गए | विवाह के बाद वह प्रकाश के किराए के फ्लैट में रहने चली गई | दोनों नोकरी करते और पूरी मस्ती से जीवन जी रहे थे | आरती की मुलाक़ात कभी कभी रीमा से होती थी रीमा भी अब किराये के फ्लैट में रहती थी ,लेकिन उसकी लाइफ स्टाइल अभी भी वही थी | जब तक जो भाया तब तक उससे दोस्ती की नहीं जमा तो छोड़ दिया या कोई नया अच्छा दोस्त मिला तो पुराने को टाटा | आरती से मिलने पर रीमा अभी भी उसकी शांत सकून भरी पारिवारिक जिन्दगी की हंसी उड़ाती |और क्या हाल हे मेरी भारतीय नारी और आदर्श पत्नी के ?
बहुत खुशहाल और उल्लासमय जीवन जी रहे हे हम रीमा | रीमा भी बहुत मस्ती से जी रही हे आरती | यु नो आई हेव व्हेरी लक्जरी लाइफ |क्या तू किसी रात अपने फ्लैट में अकेलेपन से नहीं घबराती रीमा ? आरती ने फिर एक चुभता हुआ तीर छोड़ा |अकेलापन केसा ? जब में चाहुँ फोन लगाऊ और फ्रेंड हाजिर |ठीक हे लेकिन क्या कोई एसा हे जिसे तू अपने दिल से याद करती हे ? या कोई तेरे लिए बेचेन हो या तेरे लिए दुनिया की सारी खुशियाँ छोड़ दे |
ऐसा कोई नहीं होता यार ,ये सब किताबी बातेँ हे | फ़िल्मी अंदाज हे | रियल लाइफ में तो मिलो जुलो एक दुसरे को खुश करो और आगे बड़ो | सच्चे प्यार करने वाले मिलते कहाँ हे | रीमा ने आरती के प्रश्नों से ज्यादा उत्तर एक साथ दे दिए |
आरती भी हार मानने वाली नहीं थी | उसने फिर अंतिम तीर छोड़ा अच्छा रीमा क्या तूने कभी चाहा कि कोई तुझे सच्चा साथी मिले ,जो तुझे दिल से प्यार करे तेरे शरीर से ज्यादा ?और इस प्रश्न पर चोंक गई थी रीमा | जैसे रंगे हाथो पकड़ी गई |
दो तीन वर्ष पुरानी बाते थी ये | उसके बाद आरती का मिलना जुलना कम हो गया था | फिर उनके जीवन में एक नई ख़ुशी ने जन्म लिया था पप्पू के रूप में ,वह भी अब तीनवर्ष का हो गया था | कभी कभार टेलीफोन पर बात हो जाती थी रीमा से | और एकाध बार बाज़ार में चलते चलते मुलाक़ात भी हुई तो आरती ने रीमा के स्वर का ठंडापन और उसके सोंदर्य और जिन्दादिली में आई गिरावट को स्पष्ट महसूस किया था |
ऑफिस में बिना कुछ काम किये , सोच सोच कर आरती ने तीन बजा दिए थे बड़ी बेसब्री से प्रकाश की राह देख रही थी | साढे चार बजते बजते प्रकाश पप्पू को लेकर आ चूका था | आरती ने अपनी मोपेड वहीं छोड़ी और प्रकाश के साथ मारुती से अस्पताल की और चल दी |
उपरी मंजिल के प्रायवेट वार्ड में एडमिट थी रीमा | जब आरती और प्रकाश वहाँ पहुँचे,रीमा अकेली पलंग पर लेटी थी और एक नर्स उसके सिरहाने रखे गुलदस्ते के फुल बदल रही थी | आरती को देखते ही रीमा के चेहरे पर ख़ुशी की चमक आ गई | उसने उठने का प्रयास किया लेकिन उठ ना पाई |
रीमा की नजर आरती के पीछे आते प्रकाश और उनके बीच खड़े नन्हे से पप्पू पर पड़ी | ना जाने कितने भाव रीमा के चेहरे पर आते जाते रहे जिनमेँ जिज्ञासा ,इर्ष्या ,अपनत्व और स्वयं के प्रति हीनता का समावेश था लेकिन अंततः उसने मुस्कराते हुए सभी का स्वागत किया | क्यों और कोई नहीं हे तुम्हारे पास ? आरती ने चिंतित मुद्रा में रीमा के पलंग के पास रखी खाली कुर्सीयो पर नजर डालते हुए पूछा | नहीं कुछ फ्रेंड्स आये थे और अभी कुछ देर पहले ही गए हे | रीमा ने नजरे बचाते हुए जवाब दिया | लेकिन किसी का साथ रहना तो जरुरी हे ना | हां लेकिन , आगे कुछ ना बोल सकी रीमा | घर पर खबर की क्या ? आरती की चिंता पूर्ववत थी | नहीं यार मम्मी पापा तो काफी बुजुर्ग और कमजोर हे आ नहीं पायेंगे | और भय्या ? भय्या को कहाँ छुट्टी मिलती हे नोकरी से | अच्छा हास्पीटल कौन लाया था ? आरती ने रीमा की आँखों में आँखे डाल कर पूछा वो मेरे - रीमा चुप थी |
पडोसी ने ? सच हे ना ? आरती के शूल से चुभते प्रश्न गूंजे और रीमा के चेहरे पर असहायता के भाव अचानक आ गए जो धीरे धीरे अफ़सोस में बदलने लगे | आरती ने पप्पू को उठाकर रीमा के पास बैठाया | मौसी से नमस्ते करो बेटा |और जब नन्हे पप्पू ने रीमा को विश किया तो रीमा उसकी प्यारी मनमोहनी बाल सुलभ अदा पर सम्मोहित हो गई | कितना प्यारा बच्चा हे ना आरती ? ये उसी आइस्क्रीम के डब्बे का नया फ्लेवर हे रीमा |
क्या ? आइस्क्रीम का डब्बा ? रीमा एक क्षण के लिए समझी नहीं | हां हां वही एक ही स्वाद वाला आइस्क्रीम का डब्बा वो रहा आरती ने प्रकाश की ओर हाथ उठाकर इशारा किया और मुस्कराई |लेकिन रीमा हंस ना सकी औह सारी पिछली स्मृति उसके जेहन में आने लगी साथ ही आँखों से छलकने लगे आंसुओ के धारे | अरे रीमा तू रो रही हे ? में तो तुझे हंसाने के लिए मजाक कर रही थी | आरती ने रीमा को चुप करने का प्रयास किया | लेकिन रीमा की सिसकियाँ बढती गई | अरे क्या हुआ क्यों रो रही हे पगली ? रीमा ने आरती का हाथ अपने हाथो में ले लिया और रोते रोते बोली `` मेरी सारी आइस्क्रीम पिघल गई आरती | सारे अलग अलग फ्लेवर बेरंग और बेस्वाद हो गए , और में अकेली रह गई |
आरती ने रीमा को अपनी और भींचते हुए सहलाया लेकिन रीमा की सिसकियां और कातर भावों की अभिव्यक्ति जारी थी | वह फिर बोली मेने बहुत वक्त गंवाया आरती , में लाइफ को बस आइस्क्रीम की तरह समझती रही और आज मेरे पास कुछ भी नहीं | यदि में तेरी सीख मानती तो आज आगे कुछ न कह पाई रीमा आरती ने उसका सर अपनी गोद में रखते हुए चुप करने की कोशिश की ``अभी बहुत जीवन बाकि हे रीमा , पगली जब जागे तभी सवेरा | तू जल्दी से अच्छी हो जा फिर में खोजती हु तेरे लिए एक आइस्क्रीम का डब्बा | और आरती के साथ रीमा भी हंस पड़ी | सच आरती क्या अब भी यह पोसिबल हे ? पोसिबल क्यों नहीं हम जब भी चलना शुरू करेंगे हमारी मंजिल हमारे नजदीक आती जाएगी .शर्त बस ये हे कि जीवन के सही और शाश्वत फ्लेवर को ही महत्व देना होगा |
रीमा आरती के कहने का आशय समझ रही थी , वातावरण सहज हो रहा था तभी प्रकाश ने आगे बढकर कहा ठीक हे तुम दोनों सहेलिया एक दुसरे के दुःख दर्द बांटो में कुछ नाश्ता ले के आता हूँ | हां हां ठीक हे तुम कुछ खाने का लेकर आओ आरती ने भी प्रकाश को नीचे भेजना चाहा | में कुछ आइस्क्रीम भी ले आता हु रीमा , तुम्हे कोनसा फ्लेवर पसंद हे ?
दोनों सहेलिया एक क्षण के लिए चोंकी और मुस्करादी | रीमा शर्मा गई प्लीज प्रकाश मुझे माफ़ करो , अब याद ना दिलाओ | सबके समवेत हास्य से अस्पताल का वार्ड मुस्करा उठा और प्रकाश नाश्ता लाने चल दिया |
समाप्त
महेश शर्मा धार
224 सिल्वरहीलकालोनी धार
जिला धार म .प्र .
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