पुल के पार--आशा लता दुबे

 साहित्य  सरोज पत्रिका,साप्ताहिक-लेखन प्रतियोगिता-02 ,

उत्तराखंड के सुरम्य पहाड़ों और जंगलों के बीच एक सुंदर गांव बसा हुआ था। उस गांव में उसी गांव के सरपंच की लड़की माधवी और वहां के एक शिक्षक का लड़का विशाल दोनों साथ-साथ खेलते बड़े हुए थे। उस गांव में एक पुराना पुल था, थोड़ा एकांत में था, उसका उपयोग उस गांव के लोग बहुत कम करते थे क्योंकि उस गांव में एक नया पुल बन गया था। पुराना पुल काफी जर्जर हो चुका था, इसलिए सरकार को नया पुल बनाना पड़ा था नए पुल पर से कारें , ट्रक और दूसरे भारी वाहन भी आ जा सकते थे। 

धीरे-धीरे पुराना पुल और ज्यादा उपेक्षित हो गया। वहां लोगों ने आना-जाना और कम कर दिया।  बचपन का साथ  कब प्रेम में बदल गया दोनों को पता ही नहीं पड़ा। मन ही मन वे एक दूसरे को बहुत चाहने लगे थे। एक दूसरे के बिना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। दोनों उस निर्जन पुल पर आते और घंटों आपस में प्रेम की वातें करते थे , जीने-मरने तक साथ रहने की कसमें खाते थे। 

दोनों को बचपन से उस पुल पर आकर खेलते, बड़े होते , प्रेम करते उस पुल ने देखा था। पुल भी उनका इंतजार करता था कि ,कब वह दोनों आएं और उसका अकेलापन दूर हो। जर्जर हो जाने के कारण अब उस पुल पर लोगों ने आना-जाना भी लगभग-लगभग छोड़ दिया था। कभी कोई चरवाहा अपनी बकरियां लेकर उस पर से गुजरता। बाद में धीरे-धीरे चरवाहों ने भी उस पर से गुजरना बंद कर दिया था। सरकार ने उस पुल को जर्जर और खतरनाक घोषित कर दिया था। अब उस पुल पर से कोई आता-जाता नहीं था । माधवी और विशाल  भी उस पुल के ऊपर से  इस पार से उस पार कभी नहीं जाते थे  , हमेशा पुल के किनारे आकर उस निर्जन स्थान पर आपस में बातें करते थे। 

एक न एक दिन उनके प्यार का भेद खुलना ही था। माधवी के सरपंच पिता को जब यह पता पड़ा कि माधवी उन्हीं के द्वारा उनके गांव के स्कूल में रखे गए ,एक शिक्षक के बेटे से प्यार करती है तो उनके क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने माधवी के लिए बड़े -बड़े सपने देखे थे। एक दूसरे गांव के जमींदार के लड़के से उन्होंने माधवी की शादी की बात भी तय कर रखी थी। जब उन्हें  माधवी के प्रेम के बारे में पता पड़ा तो, उन्होंने माधवी को विशाल से मिलने के लिए रोकने की बहुत कोशिश की, परंतु जब माधवी नहीं मानी और विशाल से ही  शादी करने की जिद करने लगी तो माधवी के पिता ने विशाल के पिता को नौकरी से निकाल दिया  और दोनों को गांव से निकाला दे दिया। 

गांव में सरपंच की चलती थी।, जिस तरह जल में रहकर मगर से बैर नहीं किया जा सकता उसी तरह विशाल के पिता की हिम्मत नहीं थी कि वह उस गांव में सरपंच का विरोध करके रह सके। अतः विशाल के पिता ने उस गांव से चले जाने में ही अपनी भलाई समझी। वह विशाल को लेकर दूसरे गांव में नए पुल के रास्ते चलें गयें । जाने के पहले विशाल ने अपने पिता से कहा कि पिताजी मैं आधे घंटे में आता हूं। वह दौड़कर उस जर्जर पुल के पास पहुंचा। उधर माधवी भी उस जर्जर पुल के पास पहुंच गई थी। विशाल ने उससे कहा तुम चिंता नहीं करना, मैं  तुमसे शादी करने के लिए चुनरी लेकर आऊंगा।  माधवी  को विश्वास  था  कि वह अपने माता-पिता को समझा लेगी कि उसकी शादी उसी के साथ  करें , जिसके साथ वह खुश रह सकती है।  उस दिल  के बाद माधवी ने अपने माता-पिता को समझाने की बहुत कोशिश की,  उसे पैसा नहीं चाहिए, उसे वैभव नहीं चाहिए। वह जमींदार के लड़के के साथ सुखी नहीं रह सकेगी। उसे विशाल से ही शादी करनी है। 

लड़की की यह दीवानगी देखकर माधवी के पिता की चिंता बढ़ गई। उसने जमींदार के लड़के से मिलकर माधवी की शादी की तिथी फिक्स कर दी। तीन महीने बाद शादी थी, गांव में तैयारियां होने लगी, किसी अनहोनी के डर से माधवी के पिता ने नए पुल के रास्ते पर गांव के गार्डों की ड्यूटी लगा दी थी। वह गार्ड दिन-रात पारियों में (शिफ्टों में ) वहां पहरा देते थे। उन्हें सख्त हिदायत थी , अगर विशाल इस तरफ आए तो उसे पकड़ लेना और उसको बाहर भगा देना, क्योंकि उसका गांव से  निकाला दिया जा चुका है। 

उस पुराने पुल  के पास चिड़ियाएं उड़ कर आती थीं । पुल पर बैठती थीं  और इधर-उधर की बातें करती थीं। पुल सैकड़ों साल  पुराना था,  वह पक्षियों की बोली समझने लगा था ,उसने पक्षियों को कहते सुना था कि कल माधवी की शादी है और सरपंच ने नए पुल के मुहाने पर पहरा लगा रखा है ताकि विशाल, माधवी की शादी में उस गांव में  न आ सके। शादी की खबर कोई छुपने वाली  बात नहीं थी। उस गांव के लोग दूसरे गांव में आते-जाते थे।  यह खबर विशाल तक भी पहुंच चुकी थी। मगर विशाल के पास माधवी से संपर्क करने का कोई साधन नहीं था। उस उस गांव में न मोबाइल चलते थे न मोबाइल का नेटवर्क आता था। पहाड़ों की गोद में बसा हुआ वह छोटा सा गांव हर तरह की आधुनिकसुख-सुविधाओं से दूर था। 

आज रात माधवी की शादी होने वाली थी। उसे रह-रहकर विशाल की यह बात याद आती थी कि तुम चिंता मत करना। मैं तुमसे शादी करने चुनरी लेकर आऊंगा।  मगर उसके पास विशाल को  संदेश पहुंचाने का कोई साधन नहीं था। न उसका कोई संदेश विशाल तक जा सकता था न विशाल का कोई संदेश उस तक आ सकता था। आखिरकार शादी की शाम वह घर से चुपके से  निकलकर उस जर्जर पुल की तरफ आई। जहां वह और विशाल हमेशा मिला करते थे। वह अपनी आशा भरी नज़रों से पुल को देखने लगी। कहते हैं दिल से दिल की  राह होती है।   उस दिन विशाल भी बहुत बेचैन था। उसके कदम अपने आप उस पुराने पुल की ओर उठ गए थे । 

वह चुनरी लेकर  पुल पर आ गया , उसने देखा कि नीचे उसकी प्रेमिका  माधवी भी खड़ी हुई थी। पुल ने जब दोनों को देखा तो वह प्रसन्न हो गया। पुल उनको मिलाना चाहता था। वह अत्यंत जर्जर हो चुका था। उसके जीवन का अंत होने वाला था। पुल  अपने अंत के पहले  एक अच्छा काम करना चाहता था।  पुल के इस किनारे ने दूसरे किनारे से कहा कि अब यह लड़का हमारे ऊपर से  चलकर  माधवी के पास जाएगा   और माधवी को  साथ लेकर वापस चला जाएगा। ध्यान रखना हमें गिरना नहीं है। हमें इनके प्रेम को सफल बनाना है। पुल के दोनों सिरों ने एक दूसरे को मजबूती से पकड़ लिया। विशाल चुनरी लेकर आया था, उसने  माधवी के पास  आकर माधवी को चुनरी उढ़ा दी और माधवी का हाथ पकड़कर अपने साथ  ले गया  । दोनों थोड़ी दूर  ही गए थे तभी धड़ाम से पुल के गिरने की आवाज आई। वह जर्जर पुल किसी तरह उन दोनों के मिलन तक अपने आप को संभाले हुए था। जैसे ही उन दोनों ने पुल को पार किया वैसे ही जर्जर पुल गिर गया। जाते-जाते उस जर्जर पुल ने उन दोनों को देखा। जर्जर पुल के चेहरे पर संतोष की मुस्कान थी। पानी की कलकल की आवाज आ रही थी और चिड़ियाएं चहक रही थी।

आशा लता दुबे,

भोपाल मध्य प्रदेश,

इस समय-पेरिस (यूरोप )

 मोबाइल-8109666346, ,



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