प्रेमी:
आंखों की डोली में यादों की दुल्हन
पलकों पे सितारों की बारात ठहरी है
उलझी हुई-सी हैं उसूलों की गलियां
तेरे मुलाकातों की जिनमें
सौगात ठहरी है।
तू कितनी थी कोमल, तू कितनी थी कमसिन
तेरे चंचल मन के धागों को छूकर
ये जाना था हमने
वो कैसा नशा था, वो कैसी थी सिहरन
तेरे सांसों की सिलवटों से
पहचाना था हमने
ऐसी थी हसरत, मेरी ऐसी थी ख्वाहिश
कि बांहों के झूलों में तुमको झुलाता रहूं
तू हंसती रहे, तू मुस्कुराती रहे
मैं जन्नत के दर पे खड़ा इठलाता रहूं
प्रेमिका:
वो दिन कुछ और थे, वो दौर कुछ और था
जब भौंरों की तरह गुनगुनाते थे तुम
कलियों की तरह लजाती हुई
पंखुड़ियों को फैलाती थी मैं
मगर, अब तो लौ हूं
मैं पूजा की थाली में जलती हुई
छूना भी चाहो, तो छू ना सकोगे
ऐसी अगन है अंतर में सुलगती हुई।
आंखों की डोली में यादों की दुल्हन
पलकों पे सितारों की बारात ठहरी है
उलझी हुई-सी हैं उसूलों की गलियां
तेरे मुलाकातों की जिनमें
सौगात ठहरी है।
दिनेश कुमार राय
गोला रोड, दानापुर, पटना

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