वो बचपन वाली तीज-किरण बाला का संस्मरण

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तीज का त्यौहार अपने आप में एक उमंग और उत्साह से परिपूर्ण होता है। ऐसा लगता है कि सब कुछ हरे रंग में समाहित हो गया हो। उत्सव चाहे कोई भी हो, छोटा या बड़ा उसका अपना अलग ही आनंद होता है । सभी से प्रेमपूर्ण, मिलजुलकर, अपनत्व भाव से मनाए जाने वाले त्यौहार की तो हर बात ही निराली होती है।बचपन की उन धुंधली यादों में से एक घटना जो मुझे अभी याद आ रही है कि उस दिन तीज का त्यौहार था, घर में खाने-पीने के लिए पकवान की तैयारियां  चल रही थी। हमारा घर अभी नया ही बना था, ज्यादा दिन भी नहीं हुए थे वहाँ रहते हुए इसलिए किसी से ठीक से जान पहचान भी नहीं थी।  मुझे  तीज  के दिन इस तरह घर पर बैठे रहना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था।
मैं आँगन में खेल रही थी कि अचानक मेरी नजर सामने खाली पड़े हुए मैदान की तरफ गई । उस मैदान के पीछे बहुत से  विशालकाय पेड़ थे । उन पेड़ों पर किसी ने झूला डाला हुआ था और कुछ बच्चे वहाँ पर झूल रहे थे। झूला देखकर मुझसे रहा नहीं गया और मैं झट से वहाँ पहुँच गई।उस पींग को देखकर मुझे अपने गाँव के शहतूत के पेड़ की याद आ रही थी कि कैसे हम सब चचेरे भाई-बहन उस पर मिलकर बारी-बारी से झूला झूलते थे। साथ में ये शर्त भी रखी जाती कि झूलते हुए कौन कितने शहतूत तोड़ कर लाता है। पेड़ की डाली पर ऊँचाई तक झूलने के आनंद की अभिव्यक्ति करना कठिन है।खैर, अतीत से ध्यान हटाकर मैं उन बच्चों को देखने लगी कि कब वो सब अपनी बारी समाप्त होने के बाद मुझे भी झूलने का मौका देंगे। मैं बस वहीं खड़ी अपनी बारी का इंतजार कर रही थी । सभी बच्चे बस झूलते जा रहे थे पर किसी ने मुझे झूलने के लिये नहीं कहा।
बहुत देर इंतजार करने के बाद मैं वापस घर आ गई और चुपचाप एक कोने में जाकर बैठ गई। उस समय मैं इतना व्यथित थी कि मेरे आँसू रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। एक अजीब सा आक्रोश मन में था कि कैसे बच्चे है! अपने आप को न जाने क्या समझते है?जब पापा ने मुझसे मेरे रोने का कारण पूछा तो मैंने सारी बात उन्हें बता दी... बस फिर क्या था ! पापा अपनी बिटिया को दुखी कैसे देख सकते थे? उन्होंने आव न देखा ताव, तुरंत बाजार जाकर लोहे की पाईप, जंजीर आदि जो भी झूले का सामान होता है ले आए और साथ में मिस्त्री को भी। बस फिर क्या था... कुछ ही घंटों में घर में झूला बनकर तैयार था ।  एक ऐसा झूला जिसे मैं कभी भी झूल सकती थी... जब चाहे जितना झूल सकती थी।बात यहाँ सिर्फ झूले की नहीं है, बात है तो उस प्रेम और दुलार की जिससे मेरा बचपन लबालब भरा हुआ था। 
पता नहीं पापा कैसे सभी चीज़ो को एक साथ संभाल लेते थे? बस कहने भर की देर होती थी चीज तत्काल हाजिर हो जाती हो जाती थी।  इतना अधिक ख्याल तो आज मैं चाह कर भी अपने बच्चों का नहीं रख पाई, जितना मेरे पापा मेरा रखते थे। मैं तो ज़िद्दी भी नहीं थी कि मेरी बात को मजबूरी में मानना पड़ता। कुछ घटनाएँ हमारे मस्तक पटल पर इतना गहन प्रभाव डालती हैं कि हम उसे कभी नहीं  भुला पाते । वो तीज मेरे जीवन की सबसे खूबसूरत और यादगार तीज थी ।आज भी जब मायके जाती हूँ तो गेट के सामने ही पाईप पर बँधा हुआ झूला मुझे उस दिन की याद दिलाता है... मानो कह रहा हो, मुझे छोड़ कर तुम क्यों चली गई ? 


        --- किरण बाला, चंडीगढ़



 


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