सुधा के दोहे

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माता और पिता दिवस, मना लेत हर कोय।
जो इनकी सेवा करें, हर दिन उत्सव होय।।


माता तेरी गोद में,छिपी सुखन की खान।
भाग्यहीन समझें नहीं, भटकत चारों धाम ।।


जीवन जीना हो कठिन,संग न दे संसार।
ढाल हमेशा तू बनी,लिऐ हाथ तलवार।।


मात-पिता के करज को,चुका सके ना कोय।
चुका करज जो मुक्त हो, वासौ ऋणी न होय।।


साथी तो पत्नी भई, अलग भऐ माँ बाप।
वृद्धाश्रम में भेजि कै,कूप खनावै आप।।


प्रेमी-प्रेमी सब कहैं,प्रेमी भया न कोय।
प्रेम भाव की आड़ में,छुरा पीठ में होय।।


नाते सब झूठे भऐ,झूठा सब संसार।
साँच बिचारौ है गयौ,जैसे रेत पहार।।


सबद कबहुँ ना बोलिऐ,ज्यों तरकश के तीर।
अन्तर्मन को भेदि कै, घाव करैं गंभीर।।


                       सुधा बसोर
                    (वैशाली गाजियाबाद)


 



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