जिया

जिया की आंखों में आज आंसू थे। क्या कहेंगे उसे.. हर्ष के आंसू या उदासी के थे..वो तो स्वयं जिया भी तय नहीं कर पाएगी। सामने एक दिलकश, हसीन चेहरा, खूबसूरत बड़ी बड़ी आंखे,सुर्ख गुलाबी अधर से जैसे खुशी इतनी झलक रहीं थी कि वो खुशी मुस्कान बनकर लबों पर बिखरी हुई थी।चमक थी उन आंखों में..नया जीवन शुरू करने के लिए,किसी को पाने की...सदैव सदैव के लिए किसीका अपना हो जाने की...उसे कहा पता था कि जहां पाना है वहां खोना भी है।वो खोने का अहसास तो जिया कर रही थी।हां , कहीं न कहीं खुश तो वो भी थी ,की वो जिसे प्यार करती है स्वयं से ज्यादा ,सबसे ज्यादा, उसे एक समझदार और सुरक्षित हाथों में सौंप रही हैं,वो खुश रहेंगे सदा ही ।सच्चे आशिक को ओर क्या ही चाहिए। उसका प्यार सदैव खुश रहे,मुस्कुराता रहे,तो बस खुश थी ,अपने प्यार,अपने दिलदार के लिए।आशिकी सच्ची थी ,तो आंसू लाकर छुपा लिए ,ओर खुशी का बहुत अच्छा स्वांग रचने लगी,क्योंकि वो कभी नहीं जान पाई कि आखिर ”मैं क्यों नहीं“।कई बार पूछने के बाद भी जब प्रत्युत्तर नहीं मिलता तो वो सारी उम्मीद छोड़ चुकी थी।ओर स्वीकार कर लिया था जो हकीकत थी....पर जिया विशु का सब कुछ होते हुए भी ष्जीवनसाथीष् न बन पाई। शायद ये दास्ता भी अधूरी रह गई ....जिया के अधूरे प्रेम की तरह..अधूरा लेकिन जिया के लिए पूर्ण रूप से समर्पित प्रेम....जिस्म की बात नहीं थी,

उनकी रह तक जाना है।

लंबी दूरी तय करने में ,

वक्त तो लगता है ।।

और वहीं वक्त 

रेत सा फिसल रहा था।

जैसे उसके हाथों से हाथ फिसल गया।

उसकी जान का.....

फिर कभी किसी जनम में ,

मैं इंतजार करूंगी तेरा प्रिये।

तुम मेरे ही होकर आना,

साथ सपने लेकर तो आओगे,

सिंदूर की छोटी सी डिबिया भी रख लाना।।

उम्मीद करूंगी उस वक्त तो,

तुम मेरा साथ ना छोड़ोगे।

अभी जिसके हो ,

अंतिम जनम उसके साथ का मान लो,

अब तो बुकिंग मेरी ही है ,

तुम बस इतना जान ।

जान मेरी ,जान हो तुम,

कभी कहा नहीं जाता ।

बोझील स्वासे हो गई हैं,

तुम बिन रहा नहीं जाता।।

इन्हीं खयालों में डूबी जिया ..जैसे ही अपने आंसू गिराती हैं,विशु खुशी खुशी घोड़ी चढ़ गया था। विशु जिया की ओर देखकर पूछता है (आंखों में चमक ओर चेहरे पर , प्रश्न से भाव लिए) क्या हुआ जिया इशारा करती हैं कुछ नहीं....ओर बड़ी सी मुसकान चेहरे पर लाती हैं। ओर आंखे बंद कर कहती हैं,तो अब से आप किसी ओर के हुए,दुआ करेंगे आप खुश रहे ,आपका इश्क पूर्ण हो,अधूरा न रहे....विशु घोड़ी पर बैठ चुका था। बैंड की आवाज, शहनाइयों की मधुर धुन, रिश्तेदारों का शोर, बच्चों की खिलखिलाहटकृसब कुछ इतना जीवंत था कि जैसे दुनिया आज किसी उत्सव में डूबी हो।पर उस भीड़ में एक चेहरा ऐसा भी था,जो मुस्कुरा तो रहा था। मगर भीतर पूरी तरह टूट चुका था। 

जिया उसने अपने आँसुओं को पलकें झुकाकर रोक लिया। आज रोना मना था। आज उसकी मोहब्बत की शादी थी। कितना अजीब संयोग था नाकृजिसके साथ उसने उम्रभर के सपने देखे,आज उसी को किसी और के साथ सात फेरों में बंधते देखने आई थी। कभी उसने भी सोचा था३शायद किसी दिन ऐसा ही मंडप होगा,ऐसी ही हल्दी की खुशबू, ऐसे ही हाथों में मेहंदी रची होगी।फर्क बस इतना थाकृउसकी हथेली पर लिखा नाम कभी पढ़ा ही नहीं गया।विशु ने जाते-जाते एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा। नजरों ने जैसे भीड़ को चीरते हुए जिया को ढूंढ लिया। एक पल के लिए दोनों की आँखें मिलीं। वही आँखें, जिनमें कभी अनकही बातें पलती थीं। वही खामोशी, जो कभी शब्दों से ज्यादा बोलती थी। 

पर आज उन आँखों में प्रश्न थे। जैसे विशु पूछ रहा हो ”तुम सच में ठीक हो?“ और जिया का मन चीखकर कहना चाहता था ”नहीं। बिल्कुल नहीं।मैं ठीक नहीं हूँ विशु।“ तुम्हारे जाने से जैसे मेरे भीतर कुछ हमेशा के लिए खत्म हो रहा है।ष्पर होंठों ने वही पुराना साथ निभाया। एक हल्की मुस्कान। कितना कठिन होता है ना, जिसे सबसे अधिक चाहो, उसी के सामने सबसे मजबूत दिखना।

बारात आगे बढ़ गई।जिया वहीं खड़ी रही।जैसे उसके कदमों ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया हो। उसने मुट्ठी बंद की।उसकी हथेली में आज भी वह छोटी सी चिट्ठी थी,जो उसने वर्षों पहले लिखी थी पर कभी दी नहीं।उस पर बस इतना लिखा था ”अगर कभी तुम्हें किसी ऐसे दिल की तलाश हो, जो बिना शर्त तुम्हारा हो तो मैं यहीं मिलूंगी।“

जिया हल्का सा मुस्कुराई। कितनी मूर्ख थी वो। कितनी भोली। प्रेम को हमेशा मंजिल चाहिए, ये उसने सोचा ही नहीं था। वो तो रास्तों से ही प्रेम कर बैठी थी। रात गहरा चुकी थी। फेरे शुरू हो चुके थे।अग्नि जल रही थी। मंत्रों की ध्वनि वातावरण में तैर रही थी। जिया दूर खिड़की के पास खड़ी आसमान देख रही थी।एक तारा टूटा।उसने आंखें बंद कर मन ही मन कहा ”हे ईश्वर, मेरी मोहब्बत मुझे नहीं मिली, कोई शिकायत नहीं। बस उसे हर जन्म में खुश रखना।उसकी मुस्कान कभी कम ना हो।“ फिर थोड़ी देर रुककर उसने धीमे से जोड़ाकृष्और अगर अगले किसी जन्म में प्रेम की किस्मत लिखो, तो मुझे थोड़ा सा साहस भी देना। ताकि मैं फिर अधूरी ना रह जाऊँ। 

शादी समाप्त हुई। लोग विदाई की तैयारी में लग गए। दुल्हन रो रही थी। घर वाले रो रहे थे। और एक कोने में खड़ी जिया सोच रही थी। विदाई तो मेरी भी हो रही है आज। बस फर्क इतना है,मैं किसी घर से नहीं, एक उम्मीद से विदा ले रही हूँ। उसने आखिरी बार विशु को देखा। फिर बिना कुछ कहे मुड़ गई। कुछ कहानियाँ यहीं खत्म नहीं होतीं। वो बस किताब बंद कर देती हैं,ताकि दर्द शब्दों से बाहर ना निकल आए। चलते-चलते जिया ने अपनी डायरी खोली और अंतिम पन्ने पर लिखा ”तुम्हें पाने की जिद कभी थी ही नहीं,बस तुम्हें चाहने का हक उम्र भर निभाया है।“ तुम किसी और के होकर भी,मेरी दुआओं में हमेशा मेरे रहोगे।

कलम रुक गई। आँसू उस स्याही पर गिर पड़े।और इसी के साथ जिया ने अपनी पहली और शायद आखिरी मोहब्बत एक अधूरी कविता के हवाले कर दी।समाप्त नहीं...क्योंकि कुछ प्रेम कहानियाँ खत्म नहीं होतीं, बस दिल के किसी कोने में हमेशा जीवित रहती हैं।


नेहा अंगत मांडोत +91 98241 18460


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