आज मजदूर दिवस है श्रम दिवस जो हम सब रोज करते हैं पर आज अन्तर्रााष्ट्रीय मजदूर दिवस है ,, बहुत सी सखियों ने तो ढेर सारे चुटकुले शायरियाँ भी ढूँढ ली होंगी ,वो भी किसके लिये ?अपने पति के लिये ....?
जी हाँ आजकल फेसबुक ह्वाटस्एप के जरिये सभी जागरुक रहते हैं पर क्या ये उचित है कि अपने पति पर ही जोक्स बना कर उन्हें हास्य का पात्र बनाया जाय , सभी महिलाओं से करबद्ध निवेदन है कि ऐसा कदापि न करें ये पति के सम्मान के विपरीत है वो हास्य के पात्र नहीं ,पति तो परमेश्वर हैं ,उनके लिये इस तरह का चुटकुला ह्रदय को पीड़ा पहुँचा सकता है ,भले ही वो आपसे इसके लिये कुछ न कहें, आपकी बात को हँसी में लेते हुए अपने अन्दर हुए प्रहार को सहन कर लें , और ये सोचने पर मजबूर हो जायें कि मेरी पत्नी जिसे मैं जीवन का साथी बना कर लाया हूँ ,वो मुझे मजदूर दिवस की बधाई के साथ हास्य का पात्र बना रही .सहेलियों हो सके तो उनके सम्मान में कुछ ऐसा लिखें जिससे आपके पति आप पर गर्व करें , यदि वो आपको लक्ष्मी सा सम्मान देते हैं और आप उनके घर की सर्वस्व हैं , उनको मजदूर दिवस पर चुटकुला बना कर उनके मन को पीड़ा न दें ....रही बात मजदूर दिवस की ,तो ये बात सच है कि मजदूरों की मेहनत सराहनीय है ,उनके लिये कुछ भी कहना कम होगा ,जो धूप में तपकर हमारे लिये सिर छुपाने के लिये छत बनाते हैं ,रात दिन मेहनत करके वो गरीब अपना पेट पालते हैं जिसमें महिला मजदूर पीठ पर बच्चे को लिये स्वयं ईंट बालू का बोझ उठाती हैं सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिये , ये सब उनकी परिस्थियाँ हैं ,उनकी मेहनत से ही हम वो घर बनवा पातें हैं जिसमें हम सुरक्षित रहते है ,,,
ऐसे श्रमिकों को कोटि कोटि नमन जो अपने हाथ के छालों को नहीं देखते और उन्हीं हाथों से हमारे घरों की नींव रखते हैं , अपने पसीने से उसे सींचते हैं
आप सभी को कोटिशः धन्यवाद श्रमिक भाइयों
परिश्रमी माँ के लिये एक कविता जो दिल को छू जाती है
उन माँओं को सलाम करते है
जो बाँधकर दुपट्टे से पीठ पर अपने लाल को
तपती धूप में भी पत्थरों का बोझ सिर पर लादकर
अपने लाल की एक पुकार पर अपने सीने से लगाती हैं
दिनभर के कड़े श्रम से मुश्किल से दो रोटी जुटाती हैं
टुकड़े के कलेजे को जब वो दूध पिलाती है
अपने श्रम की थकान मिटाती हैं
वक्त के साथ सब कुछ ढलता चला गया
वो लाल नौजवान होता चला गया
बीते वक्त के साथ माँ के बलिदानों और श्रम का न कोई बोध था
बुढ़ापा ही माँ का उसके काँधों पे अब बोझ था
जो बाँधकर काँधे से तपती धूप में चलती थी
सिर पर पत्थरों को लादकर
नंगे पैरों से चलकर
कँकरीले रास्तों पर
....
स्वरचित
सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज
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