अंजान सफ़र -डॉ.विभाषा

अकेले ही निकल पड़ी हूँ
एक अनजान सफ़र में
किस ओर जाना है
कुछ भी पता नहीं
चलते-चलते बहुत बार
ऐसा लगा जैसे किसी ने
पीछे से पुकारा हो
मग़र पीछे पलटकर देखने पर 
दूर-दूर तक कोई भी नहीं है
सामने लंबी-चौड़ी सड़कें ही दिखाई देती हैं
और उसपर मैं चुपचाप चलती ही जा रही हूँ
एक अनजान सफ़र की ओर
जहाँ पहुँच पाना मेरे बस की बात नहीं थी
मग़र मेरे हौसलों ने अब तक संबल बनाए रखा
वह राह में आए काँटों को हटाते रहे
और इस तरह मेरे हौसलों ने मेरे
इस अनजान सफ़र के कठिन डगर को
मेरे लिए आसान बना दिया।


डॉ.विभाषा मिश्र
रायपुर(छ.ग.)



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