कुछ रह जाते हैं और कुछ छोड़ जाते हैं ;
दोनों में मनुष्यता है,
दोनों ही कुछ न कुछ बचाने की चेष्टा में हैं।
एक में सुख है तो दूसरे में उस सुख का दुःख।
दो वक़्त की रोटी
परिवार को अपने दे सकें
इसलिए अपने गाँव से दूर आने में जो
घाव मिले उसे मिट्टी से थाप कर,
ज़िन्दा हैं
ये भी नागरिक हैं
इनका देश से जिस्म का रिश्ता है
वो महीने भर का राशन नहीं रखते
घर में रहना इनके लिए आसान नहीं
वो  डरते नहीं
जो लौट रहे हैं अपने पेट के भय से
अपने वर्तमान में 'लौटना' 
भविष्य को बदलता है 
लेकिन इन्होंने कब सोचा होगा 
'लौटना' गैर-ज़िम्मेदारी का कलंक देगा। 
ये अपने अंतक से लड़ने को तैयार
भी हैं और 'जो होगा देखा जायेगा'
इसके लिए प्रतीक्षारत भी ।


~ तान्या सिंह
गोरखपुर, उत्तर-प्रदेश