खुद को पत्र-शिल्‍पा

जब की बात आती है तो ना जाने क्यों मैं बहुत खुश हो जाती हूं। मैं खुद को बहुत प्यार करती हूं अपना बहुत ख्याल रखना मुझे बेहद पसंद है और यह तब हुआ जब मैं एक भयानक बीमारी से जूझ रही थी और फिर अचानक मुझे दूसरी जिंदगी खुदा ने बक्शी तब मुझे होश आया और मैं बहुत दिनों तक खुद से अंदर ही अंदर लड़ती रही कि मैंने पहले कभी खुद पर कोई ध्यान नहीं दिया और अब मैं वह सब करूंगी जो पहले नहीं किया।पहले में कभी अगर नए कपड़े खरीदती और संभाल कर रख देती कि कहीं खराब ना हो जाए छोटी-छोटी कई इच्छाओं को मन में ही मार लिया आरती की कल करूंगी या फिर कभी और कर लूंगी मगर अब मैंने खुद से वादा कर लिया कि मेरा जोजी चाहेगा वह मैं तुरंत कर लूंगी क्योंकि जिंदगी का क्या भरोसा आज है कल नहीं यूं तो इच्छाओं की कोई सीमा नहीं परंतु छोटी-छोटी ख्वाहिशों को अगर हम अपनी इच्छा के पंख दे दे तो दिल को जो सुकून मिलता है उसकी क्या कहने!!


शिल्‍पा अरोड़ा विदिशा



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