खाने की बर्बादी-शिल्‍पा

खाना यानी " अन्न" अन्न को हमारे देश में भगवान माना जाता है। हमारे पूर्वज खाने के पहले मंत्र उच्चारण किया करते थे "अन्न देव सुखी भव:" जिससे यह अन्न हमारे शरीर में जाकर हमें सुख प्रदान करें और हमारी इंद्रियों को तृप्त करें । परंतु बहुत अफसोस की बात है कि हम अपनी संस्कृति को भूल चुके हैं और कई तरह की चीजें बनाकर या जरूरत से ज्यादा बनाकर इसे बर्बाद करने पर उतारू हैं यह बिल्कुल गलत है इसे रोकना सिर्फ और सिर्फ हमारी जिम्मेदारी है हम आज टेक्नॉलॉजी की दुनिया में जी रहे हैं कपड़ों से गैजेट से सबसे आधुनिक हो गए हैं इसका मतलब यह कतई नहीं कि हम अपनी संस्कृति को भूल जाए और आधुनिकता का ढोंग रचाए जिस अन्न को किसान अपने खून पसीने से उगाता है और कई प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद तो खाने के रूप में हमारी थाली में पहुंचता है उसे बर्बाद करने का हमें कोई हक नहीं हमारी हिंदू संस्कृति हमेशा से खाने की बर्बादी को गलत ही बताती आ रही है और हमें उसका सम्मान करते हुए और भगवान का शुक्र मनाते हुए आधुनिकता को छोड़कर खाने का सम्मान करना चाहिए।


शिल्‍पा अरोड़ा विदिशा मध्‍यप्रदेश



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