लिखा पत्र पर दे न सका-ओम जी

 रही प्रेम अभिव्यक्ति अधूरी।

हर इच्छा  कब  होती  पूरी।


राह वही, पग वही किन्तु फिर,

यह दूरी क्योंकर गहराए?

प्रेम-पत्र ले बैठ राह में,

नैन निहारें मन सकुचाए।

तू चलती जाती है आगे,

पीछे छूटे मेरे सपने,

चुपके-चुपके इस अंबर से,

ढली साँझ भी नीर बहाए।।

देख- देख मेरी मजबूरी।

रही प्रेम अभिव्यक्ति अधूरी।


 थाम पुस्तकें तू हाथों में

पगडंडी पर बढ़ती जाती।

शीतल मन्द बयार तुझे छू,

आती साँसों को तड़पाती।

पूछ रही है तरु की छाया,

"क्यों मन का सिहराव न बोला?",

लिखा पत्र पर दे न सका जो,

आज हमारे मन की थाती।।

याद  आ  रही  आँखें भूरी।

रही प्रेम अभिव्यक्ति अधूरी।


 मौन विरह का साक्षी यह तरु,

मेरे मन भावों, सनेह का!

शब्द लिखे पर भाव न पहुँचे,

भटके पथ पाया न गेह का।

उलझ गई साँसों की सरगम,

हो असहाय न सुलझा पाया,

तेरा मृदुल आचरण भाया,

लोभ न किञ्चित रहा देह का।

देव मिटाओ मन की दूरी।।

रही प्रेम अभिव्यक्ति अधूरी।


ओम जी मिश्र 'अभिनव'

लखनऊ



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