( साहित्य सरोज पत्रिका का साप्ताहिक लेखन प्रतियोगिता '02' )
भेज रही हूँ ख़त तुम्हें,
दिल का राज़ बयाँ करके।
उस रोज़ जो बेवफ़ाई मेरे होठों ने की,
अधूरे वे जज़्बात लिख रही हूँ।
एक प्यार-सा एहसास हो तुम,
इश्क़, मोहब्बत और प्यार नहीं,
पर बेशक़, यार बेमिसाल हो तुम।
बिन मिलाए निगाहें,
अल्फ़ाज़ों से ही जो दिल धड़का दे,
वैसा एक अंदाज़ हो तुम।
तुम्हें पाने की तमन्ना नहीं,
पर तुम्हें खोने का डर बेशक़ है।
सफ़र तुम्हारे साथ अधूरा रहा,
तुमसे मिलना अब एक सपना-सा हुआ।
अपना बनाने की कोशिश की नहीं,
क्योंकि पराए तो तुम कभी लगे ही नहीं।
क्या कहूँ और कैसे कहूँ,
ज़ुबान कभी बोलती नहीं,
और निगाहें चुप रहती नहीं।
ख़्वाहिश अधूरी, मुलाक़ात अधूरी,
सफ़र हमारा छोटा था।
तुम बसे हो दिल में हमारे,
यही अधूरी बात थी,
जो तुमसे कहना था।
निधि कुमारी सिंह कोलकाता – 700114
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