साहित्य सरोज पत्रिका का साप्ताहिक लेखन प्रतियोगिता 2
कभी जो रूठ जाऊँ मैं...
कभी जो रूठ जाऊँ मैं,
तो हँसकर तुम मना लेना,
बहुत मुश्किल नहीं होगा,
मुझे अपना बना लेना।
कभी जो कह न पाऊँ मैं,
तो गले मुझको लगा लेना,
मेरी ख़ामोश धड़कनों को,
बस दिल से तुम सुन लेना।
आँखों की तलब पढ़ लेना,
नज़रों में मुझे भर लेना,
मेरे दिल की हर धड़कन का,
बिन बोले ही अर्थ समझ लेना।
अगर लगे राहें जुदा हैं,
तो हाथ मेरा थाम लेना,
कदम से कदम मिला कर,
हर फ़ासला मिटा देना।
कभी जो रूठ जाऊँ मैं...
मधु गुप्ता "महनूर"
गाज़ियाबाद [उत्तर प्रदेश]
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