आँसुओं के मोती, अटूट दोस्ती- मधु गुप्‍ता


साप्ताहिक-लेखन प्रतियोगिता 02

सरिता रागिनी का हाथ थामे उससे कुछ कहने की कोशिश कर रही थी। होंठ काँप रहे थे, पर शब्द बाहर आने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। मन ही मन वह जाने क्या-क्या बुदबुदा रही थी।रागिनी ने उसकी ओर गौर से देखा और पूछा,"सरिता, तुमने कुछ कहा क्या?"ा सरिता की आँखें भर आईं। उसने काँपती आवाज़ में कहा,  "रागिनी, आज मैं जो तुम्हें बताने वाली हूँ, उसे सुनकर तुम मुझसे नाराज़ तो नहीं हो जाओगी? मुझे गलत तो नहीं समझोगी?"रागिनी हल्के से मुस्कुराई और उसका हाथ दबाते हुए बोली "कैसी बातें कर रही हो! तुम मेरी बचपन की दोस्त हो। तुम्हारी किसी बात का मैंने कभी बुरा माना है जो आज मानूँगी? पहले यह तो बताओ, बात क्या है?" सरिता उठी और रागिनी का हाथ पकड़कर अपने कमरे की ओर ले गई।

शाम ढल रही थी। पक्षी आसमान में अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। बादलों के पीछे छिपता सूरज अपनी अंतिम लालिमा बिखेर रहा था। कुछ ही पलों में वह डूब जाने वाला था और सरिता को लग रहा था मानो उसके मन का उजाला भी उसी सूरज के साथ ढलता जा रहा हो। कमरे में पहुँचकर उसने रागिनी को कुर्सी पर बैठाया और स्वयं बिस्तर पर बैठ गई। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने धीमे स्वर में कहा, "रागिनी... तुम्हें याद है, हमारे कॉलेज में रोहन है? वही, जो पढ़ाई में बहुत होशियार है और देखने में भी बहुत अच्छा लगता है। पता नहीं, कब मैं उसे पसंद करने लगी। कब उसका जॉली स्वभाव मेरे मन को अच्छा लगने लगा, मुझे खुद भी नहीं पता चला। उसे देखते ही उसकी गहरी नीली आँखों में खो जाती थी। लेकिन उसने कभी मेरे हाव-भाव पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मैं असमंजस में रहती, दुखी हो जाती, फिर भी न जाने क्यों उसे चाहती चली गई।"उसने गहरी साँस ली।

"आज कॉलेज से निकलते समय मैंने उसे बाहर खड़ा देखा। पता नहीं मुझमें कहाँ से हिम्मत आ गई। मैं उसके पास गई और बिना कुछ सोचे-समझे अपने दिल की सारी बात एक ही साँस में कह दी।"रागिनी चुपचाप उसे सुन रही थी।सरिता आगे बोली,"मेरी बात सुनकर वह पहले तो झिझका। फिर मुस्कुराकर बोला,'वाकई, क्या यह सच है? या तुम मुझसे मज़ाक कर रही हो?' वह हँसा भी... लेकिन जब उसने मेरी आँखों में आँसू देखे तो तुरंत गंभीर हो गया।" "फिर?" रागिनी ने धीमे से पूछा।
"वह मुझे कॉलेज की कैंटीन में ले गया। वहाँ बहुत शोर था। कोई दोस्तों के साथ बैठा था, कोई अपनी दुनिया में खोया था। उसने मुझसे पूछा—'क्या लोगी? चाय या कॉफी?' लेकिन मैं कुछ नहीं बोली। उसके कई बार पूछने पर मैंने कहा—'जो मन हो मँगवा लो।' उसने दो कॉफी मँगवा ली।"सरिता की आँखों से आँसू बह निकले। "फिर उसने कहा—'सरिता, मैं जो तुम्हें बताने जा रहा हूँ, उसे ध्यान से सुनना और खुद पर किसी तरह का दबाव मत डालना। नाराज़ भी मत होना।' यह सुनकर मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।"

"उसने मेरे हाथ पर अपना हाथ रखा और बोला—'मैं और रागिनी पिछले तीन साल से एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। हमने अभी तक किसी को इसके बारे में नहीं बताया। शायद रागिनी ने तुम्हें भी नहीं बताया होगा। हम नहीं चाहते थे कि कॉलेज में बातें बनें या हमारी पढ़ाई पर असर पड़े। जैसे ही पढ़ाई पूरी होती, हम सबको बता देते। अगर अनजाने में तुम्हें दुख पहुँचा है तो उसके लिए मुझे सच में अफ़सोस है। लेकिन कृपया रागिनी को गलत मत समझना। उसने कई बार तुम्हें बताना चाहा, मगर मैंने ही उसे रोक दिया था।'" सरिता का स्वर भर्रा गया। "उस पल लगा जैसे किसी ने मेरे भीतर कुछ तोड़ दिया हो। मेरा हाथ काँपने लगा। चेहरा पीला पड़ गया। आँखों से आँसू बह निकले। मन में हज़ारों सवाल उमड़ पड़े।"

"मैंने धीरे से अपना हाथ उसके हाथ के नीचे से खींच लिया और बस इतना कहा—'मुझे देर हो रही है... कॉफी फिर कभी पी लेंगे।'और मैं वहाँ से चली आई।" वह कुछ पल चुप रही। "रास्ते भर मैं खुद से सवाल करती रही। तीन साल से तुम दोनों को साथ देखती रही, फिर भी मैं यह क्यों नहीं समझ पाई कि तुम दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हो? मैं इतनी नासमझ कैसे हो गई?" इतना सुनते-सुनते रागिनी की आँखें भी नम हो चुकी थीं। वह उठी और सरिता को गले लगाते हुए बोली, "आई एम सॉरी, सरिता। मैं तुम्हें दुख देना नहीं चाहती थी। मैं नहीं चाहती थी कि लोग बातें बनाएँ या घर में परेशानियाँ खड़ी हों। बस इसी वजह से मैंने तुम्हें भी नहीं बताया। मुझे माफ़ कर दो... मेरी प्यारी दोस्त।"
सरिता ने अपनी आँखों से आँसू पोंछे।उसने महसूस किया कि जीवन में हर प्रेम मुकम्मल नहीं होता। कुछ प्रेम अधूरी दास्तान बनकर आत्मा के किसी कोने में रह जाते हैं, और कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें बचा लेना ही सबसे बड़ी जीत होती है। उसने मुस्कुराने की कोशिश की और रागिनी का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, "नहीं, मेरी प्यारी दोस्त... माफ़ी मत माँगो। रोहन तुम्हारा था और हमेशा तुम्हारा ही रहेगा। मैं तो बस अनजाने में बीच राह भटक गई थी।" उसने रागिनी का हाथ चूम लिया। "बस एक वादा करो... तुम हमेशा मेरी दोस्त बनी रहोगी। कभी मुझ पर शक नहीं करोगी।" रागिनी ने उसे फिर से गले लगा लिया।

उस दिन सरिता ने अपने टूटे हुए सपनों के टुकड़ों को समेटना शुरू कर दिया। उसने अपनी पलकों पर ठहरे आँसुओं को पोंछ लिया। कुछ मोती अधूरे प्रेम के थे, कुछ दोस्ती के विश्वास के और कुछ आत्मस्वीकार के। उसने उन बिखरे हुए मोतियों को अपने भीतर सहेज लिया और उनसे एक नई माला पिरो ली—त्याग, मित्रता और परिपक्व प्रेम की माला। शायद जीवन का यही सत्य है कि हर चाहत मंज़िल तक नहीं पहुँचती, लेकिन जो रिश्ते टूटने के बाद भी मन में सम्मान छोड़ जाएँ, वही सबसे अनमोल होते हैं। उस दिन सरिता ने अपने आँसुओं के मोतियों की माला पिरो ली—हमेशा के लिए।

– मधु गुप्ता 'महनूर' 



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